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Thursday, October 15, 2026
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जा रहा था जब ये सूरज डूबने। पंछियों की वापसी अच्छी लगी।।

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ग़ज़ल

-शकूर अनवर-

shakooranwar

बिखरी-बिखरी हर ख़ुशी अच्छी लगी।
मुन्तशिर* सी ज़िन्दगी अच्छी लगी ।।
*
उसकी दानाई* का मैं क़ाइल* हुआ।
मुझको उससे दुश्मनी अच्छी लगी।।
*
टेड़ी- मेढ़ी दूर तक ग़म की क़तार।
सांप जैसी यह नदी अच्छी लगी।।
*
जा रहा था जब ये सूरज डूबने।
पंछियों की वापसी अच्छी लगी।।
*
होत-होते दिन भी पूरा हो गया।
जाते-जाते शाम भी अच्छी लगी।।
*
नर्म फूलों से चुने रस्ते भी थे।
क्यूँ झुलसती रेत ही अच्छी लगी।।
*
काॅंपती रातों का अपना हुस्न था।
सर्दियों की चाॅंदनी अच्छी लगी।।
*
ऑंधियों के लश्करी* अंदाज़ थे।
मौसमों की छावनी अच्छी लगी।।
*
जगमगाते शहर में “अनवर” मुझे।
अपने घर की ही गली अच्छी लगी।।
*
मुन्तशिर* छिन्न भिन्न, बिखरी हुई,
दानाई* बुद्धिमत्ता,
क़ाइल* मान लेना,
लश्कर*फ़ौजी,
*
शकूर अनवर

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