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Friday, October 16, 2026
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यह आवाज़ मां सी क्यूं लग रही है

delicious assortment traditional roti
Image by monika gupta
मोनिका गुप्ता

तप रहा है तंदूर
कामगार , रोटियां लगा रहा है
अभी कुछ कच्ची हैं
थोड़ा पानी लगा इन्हें पलटना होगा
तंदूर का यही दस्तूर है

तप रहा है तंदूर
कहा जाता है
जहांगीर जहां जाता
साथ चलता रसोईया, तंदूर लिए
वैसे सिंधू घाटी में मिलती है
तंदूर की बुनियाद
और अवशेष तो सुदूर
प्राचीन मिश्र तक फैले हैं

याद है
मोहल्ले की औरतें
घरों से गुंथा आटा लातीं
सजती महफ़िलें
लोकगीतों संग लगायी जातीं
तंदूर में रोटियां
कोई धर्म, जाति, वर्ण काबिज़ न होते
तंदूर पर
उसकी आंच सबके लिए रहती ,एक सी

तंदूर दहकते देख
युवा हुआ
उसके अंतस का सुर्ख़ गर्म रंग
ऐसे चमकता
कि जब शुरू हुई,अंधेरा भरी भटकन
वही दहक याद करता ,मुस्काता

भखती है जब माटी
सुंदर , भली – भली लगती है
हो ज्यूं धरती की कोख़ खिली – खिली
जैसे चटखा गुलमोहर हो
सिंदूरी सूरज , अंबर बनाता रंगीला
जैसे प्रेमिका का चुंबन , नशीला

खड़ा हूं तंदूर के पास
खरीदनी हैं रोटियां
पूछा है बुज़ुर्ग सरदार जी ने
बेटे ! नर्म लगाऊं या कड़क
यह आवाज़
मां सी क्यूं लग रही है .
मोनिका गुप्ता

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