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Friday, October 16, 2026
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हम अभी मैकदे में ठहरेंगे। जिनको जाना है जाये जन्नत में।।

shakoor anwar 129
शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

कैसे जीते हैं लोग नफ़रत में।
अपनी तो कट गई मुहब्बत में।।
*
आदमी आदमी की ज़द पर* है।
इतनी शिद्दत* है क्यूॅं अदावत* में।।
*
उसकी बातें हैं ज़ह्र आलूदा*।
क्या ये शामिल है उसकी आदत में।।
*
ये मियाॅं कारोबार ए उल्फ़त है।
बस ख़सारा* है इस तिजारत*में।।
*
अपना अंदाज़ है फ़क़ीरी का।
चैन मिलता नहीं है दौलत में।।
*
हम अभी मैकदे में ठहरेंगे।
जिनको जाना है जाये जन्नत में।।
*
फूल कोई नहीं है तुम जैसा।
तुम बनाये गये हो फ़ुर्सत में।।
*
इश्क़ तो जान ले के छोड़ेगा।
पड़ गये हम भी किस मुसीबत में।।
*
जो मिटाने पे तुल गया “अनवर”।
मिट गये हम उसी की चाहत में।।
*

ज़द पर* निशाने पर
शिद्दत*तीव्रता
अदावत*दुश्मनी
ज़ह्र आलूदा* ज़हरीली
ख़सारा* नुक़सान घाटा
तिजारत* व्यापार

शकूर अनवर
9460851271

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