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Thursday, October 15, 2026
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यूँ बहारें तो कितनी ही आई गयी,इस चमन में नहीं फूल ही खिले।

-डॉ.रामावतार सागर-

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डॉ.रामावतार मेघवाल “सागर”

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एक जीवन में कितने वनवास थे,एक वनवास में कितने जीवन पले,
यूँ बहारें तो कितनी ही आई गयी,इस चमन में नहीं फूल ही खिले।

हम अनायास ही बँध गये डोर से, प्राणप्रण से निभाया गया प्रेम पर,
एक संदेह सलिला बहा ले गयी,एक पुल जो बनाया गया नेह पर।
कितने मौसम बनते बिगड़ते रहे,आशियाने कहीं पर कहीं दिल जले।
यूँ बहारें कितनी ही आई गयी,इस चमन में नहीं फिर सुमन ही खिले।(1)

था अगर शाप तो बस मुझे क्यों मिला,जब दोनों बराबर के हकदार हैं।
प्यार को पाप का नाम दे तो दिया,आज कितने यहाँ पर गुनहगार हैं।
हाँ कठिन तो बड़ी है डगर प्रेम की,ज्यों तलवार पर कोई पैदल चले।
यूँ बहारें कितनी ही आई गयी,इस चमन में नहीं फिर सुमन ही खिले।(2)

साधना सा हुआ सार जीवन मगर,मुझको वरदान में भी तुम ना मिले।
योग करने का हासिल कुछ भी नहीं,जोड़ करने से भी जब तुम ना मिले।
इस अधूरी कहानी के वो पृष्ठ तुम,लिखने वाले जिनको कहीं ना मिले।
यूँ बहारें कितनी ही आई गयी,इस चमन में नहीं फिर सुमन ही खिले।(3)
डॉ.रामावतार सागर
सहायक आचार्य हिंदी
कोटा, राजस्थान
9414317171
Ramavtar.gcb@gmail.com

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