29.7 C
Kota
Thursday, October 15, 2026
Home Literature अब इबादत में भी दिखावा है। अब दुआ में नहीं असर बाबा।।

अब इबादत में भी दिखावा है। अब दुआ में नहीं असर बाबा।।

ghazal of shakoor anwar

ग़ज़ल

-शकूर अनवर-

शकूर अनवर

मरहले* इसके पुर ख़तर* बाबा।
ये मुहब्बत की है डगर बाबा।।
*
कौन आया है लौटकर बाबा।
फिर ख़लाओ* का है सफ़र बाबा।।
*
बज रहा है सुनो गजर* बाबा।
अब तो नज़दीक है सहर* बाबा।।
*
लुट ही जाते हैं मालो-ज़र* बाबा।
तुमको किस बात का है डर बाबा।।
*
शगल* कुछ और हो किफ़ालत* का।
ये फ़क़ीरी नहीं हुनर बाबा।।
*
ये तो ऐवान* हैं हुकूमत के।
“आ गये तुम इधर किधर बाबा”।।
*
अब इबादत में भी दिखावा है।
अब दुआ में नहीं असर बाबा।।
*
ऐसे आया वो ज़िंदगी में मेरी।
कर गया सब इधर उधर बाबा।।
*
इस पे क़िस्सा तमाम हो जाये।
उसकी चौखट हो अपना सर बाबा।।
*
रेत तपती है पाॅंव जलते हैं।
दूर तक भी नहीं शजर बाबा।।
*
जिसने भटका दिया मुझे “अनवर”।
कैसे आता वो राह पर बाबा।।
*

मरहले*पड़ाव,
पुरख़तर*ख़तरों से भरी,
ख़लाओं*शून्य
गजर बजना*सुबह के वक्त घड़ियाल का बजना,
सहर* प्रात काल सुबह,
मालो-ज़र* रुपया सोना
शगल* काम, पेशा,
किफ़ालत*भरण पोषण,
ऐवान*सदन’ महल,

शकूर अनवर
9460851271

Advertisement