
-114 नेताओं को राष्ट्रीय पर्यवेक्षक बनाकर साधे असंतुष्ट
-अब अपनी राजनीतिक ताकत साबित करने की चुनौती
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस के 114 नेताओं को ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान का राष्ट्रीय पर्यवेक्षक बनाया गया है। इसे राहुल गांधी की एक ऐसी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा सकता है, जिसके जरिए उन्होंने पार्टी के भीतर लंबे समय से उपेक्षित महसूस कर रहे नेताओं को जिम्मेदारी देकर उन्हें सक्रिय करने की कोशिश की है। इनमें कई ऐसे नेता हैं, जो जिम्मेदारी नहीं मिलने की शिकायत करते हुए पार्टी की सक्रिय राजनीति से दूर बैठे थे। उनकी नाराजगी का तर्क यही रहा कि कांग्रेस हाईकमान उन्हें कोई महत्वपूर्ण काम नहीं सौंप रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब राहुल गांधी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष करते दिखाई देते हैं, तब कांग्रेस के कई नेता अपनी ही पार्टी में जिम्मेदारी नहीं मिलने से नाराज होकर क्यों बैठे रहते हैं? क्या पार्टी के भीतर असंतोष की यह स्थिति उसकी राजनीतिक सक्रियता को कमजोर नहीं करती?
रूठों को जिम्मेदारी, अब प्रदर्शन की बारी
राहुल गांधी ने इन 114 नेताओं को राष्ट्रीय पर्यवेक्षक बनाकर एक ऐसा काम सौंपा है, जिसका सीधा संबंध उनकी राजनीतिक क्षमता, जनसंपर्क और संगठनात्मक ताकत से है। अब इन नेताओं को जनता के बीच जाकर काम करना होगा और यह साबित करना होगा कि वे वास्तव में कितने लोकप्रिय हैं तथा संगठन को कितना मजबूत बना सकते हैं।
इनमें ऐसे नेता भी शामिल हैं, जो अपने वार्ड में कांग्रेस को चुनाव नहीं जिता पाए। कुछ नेता विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, जबकि कुछ को राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक पद मिलने के बावजूद चुनावी सफलता नहीं मिली। कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने राज्यों में मुख्यमंत्री रहे, लेकिन कांग्रेस को दोबारा सत्ता में नहीं ला सके।
ऐसे नेताओं के सामने अब अपनी राजनीतिक उपयोगिता साबित करने की चुनौती है। केवल बड़े पदों पर रहने या संगठन में प्रभावशाली होने से राजनीतिक ताकत साबित नहीं होती। असली परीक्षा जनता के बीच जाकर काम करने और पार्टी के पक्ष में समर्थन जुटाने की है।
पहले अपना वार्ड बचाएं, फिर देश बचाने निकलें
‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ का नारा जितना बड़ा है, उसकी सफलता की शुरुआत उतने ही छोटे स्तर से होनी चाहिए। राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को सबसे पहले अपने वार्ड, मोहल्ले और आसपास के लोगों के बीच अपनी सक्रियता साबित करनी होगी। यदि वे अपने क्षेत्र में ही कांग्रेस का जनाधार मजबूत नहीं कर पाते, तो राष्ट्रीय स्तर पर अभियान को सफल बनाने का दावा कितना प्रभावी होगा?
इन नेताओं को अपने परिवार, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से संपर्क करना चाहिए। उन्हें यह पता लगाना चाहिए कि उनके घरों और आसपास कितने ऐसे युवा हैं, जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं या कर रहे हैं और जिनका नाम मतदाता सूची में जुड़ना बाकी है। नए मतदाताओं का पंजीकरण सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ाने का महत्वपूर्ण काम है।
यदि राष्ट्रीय पर्यवेक्षक अपने क्षेत्र में यह जिम्मेदारी गंभीरता से निभाते हैं, तो इससे न केवल मतदाता सूची से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में मदद मिलेगी, बल्कि पार्टी का स्थानीय जनसंपर्क भी मजबूत हो सकता है।
कार्यकर्ताओं पर हुक्म चलाने से नहीं चलेगा अभियान
कांग्रेस की एक बड़ी समस्या यह भी रही है कि कुछ नेता संगठन में अपना प्रभाव कार्यकर्ताओं पर हुक्म चलाने तक सीमित रखते हैं। वे पद और प्रतिष्ठा तो चाहते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर मेहनत करने से कतराते हैं। यदि राष्ट्रीय पर्यवेक्षक भी इसी कार्यशैली के साथ अभियान में उतरते हैं, तो राहुल गांधी की यह पहल अपने उद्देश्य से भटक सकती है।
हाईकमान को यह सुनिश्चित करना होगा कि नियुक्तियां केवल नाराज नेताओं को संतुष्ट करने का माध्यम न बनें। पर्यवेक्षकों के काम की समीक्षा हो और यह देखा जाए कि उन्होंने मतदाता सूची में नए नाम जुड़वाने, लोगों से संपर्क करने तथा संगठन को मजबूत करने के लिए वास्तव में क्या किया।
राहुल गांधी ने इन नेताओं को जिम्मेदारी देकर उनके सामने अपनी क्षमता साबित करने का अवसर रखा है। अब देखना यह है कि वे इस अवसर का इस्तेमाल जमीनी राजनीति में सक्रिय होने के लिए करते हैं या अपनी जिम्मेदारी को भी महज एक पद की तरह लेते हैं।
आखिरकार, कांग्रेस को केवल बड़े-बड़े राजनीतिक नारों से मजबूती नहीं मिलेगी। उसके नेताओं को अपने क्षेत्रों में उतरना होगा, कार्यकर्ताओं के साथ काम करना होगा और मतदाताओं से सीधा संवाद स्थापित करना होगा। यदि 114 पर्यवेक्षक अपने-अपने क्षेत्र में ही पार्टी के लिए प्रभावी काम कर लेते हैं, तो ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान को वास्तविक ताकत मिल सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)


















