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Friday, October 16, 2026
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कभी ये पन्ने भी बिखरे पड़े होंगे मुड़े तुड़े से…

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तुम्हारी डायरी

-राम स्वरूप दीक्षित-

ram swaroop dixit
रामस्वरूप दीक्षित

एक दिन
तुमने फाड़ दिए
अपनी डायरी से
वे सारे पन्ने
जिन पर लिखा था मेरा नाम
और लिखी हुई थीं
वे अधूरी कविताएं
जिनको पूरा करना था हमें
मिलकर एक साथ

जिनमें दर्ज थे
वे सारे खुशनुमा पल
जो बिताए थे हमने साथ –साथ
समय के बटुए से चुराकर

डायरी अब भी लिखी जा रही
बिला नागा

जिसमें दर्ज हो रहे रोज
नए – नए नाम
और अलहदा किस्म के अनुभव
कुछ तसवीरें भी की जा रहीं नत्थी
और लिखे जा रहे
उनसे जुड़े रंगीन किस्से

कभी ये पन्ने भी बिखरे पड़े होंगे
मुड़े तुड़े से
किसी चमचमाती सड़क के किनारे

और उनमें फड़फड़ा रहे होंगे
किसी की यादों के चूज़े

और तुम फिर लिख रही होगी
अपनी डायरी में
कुछ नए नाम
नए सिरे से
नए पन्ने पर

तुम्हारी डायरी
नहीं ढोती
अपने ही
पिछले पन्नों का बोझ

राम स्वरूप दीक्षित

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