33.7 C
Kota
Saturday, October 17, 2026
Home Literature जितने मज़लूम हैं ज़माने में। उनको तू अपनी सर परस्ती दे।।

जितने मज़लूम हैं ज़माने में। उनको तू अपनी सर परस्ती दे।।

shakoor anwar 00
शकूर अनवर

ग़ज़ल

-शकूर अनवर-

अब तो ख़ुशियों की मय* बरसती दे।
ज़िंदगी दी तो मौज मस्ती दे।।
*
गेहूॅं चावल अगर चे महॅंगे हैं।
इक मुहब्बत तो हमको सस्ती दे।।
*
है तुझे देखने की ताब* किसे।
ऑंख दीदार को तरसती दे।।
*
डूब जाऊॅं तेरे ख़यालों में।
इस बुलंदी* पे ऐसी पस्ती* दे।।
*
दौलते दर्द शायरों को मिले।
उनकी ग़ज़लों में ग़म परस्ती दे।।
*
जितने मज़लूम हैं ज़माने में।
उनको तू अपनी सर परस्ती दे।।
*
शर पसंदी* से दे निजात* “अनवर”।
अम्न वालों को दिल की बस्ती दे।।
*

मय*मदिरा
ताब* ताक़त
बुलंदी* उॅंचाई
पस्ती* बहुत नीचे
मज़लूम* पीड़ित,
शर पसंदी* लड़ाई, झगड़ा,
निजात* छुटकारा, मुक्ति,

शकूर अनवर

Advertisement
1 Comment
Oldest
Newest Most Voted