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Thursday, October 15, 2026
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मात खाना ही जब ज़रूरी था। चल के फिर एक चाल क्या करते।।

shakoor anwar
शकूर अनवर

ग़ज़ल

-शकूर अनवर-

ज़िंदगी ला ज़वाल* क्या करते।
ख़िज्र* से फिर सवाल क्या करते।।
*
ख़ुद को ख़ुद से भुलाए बैठे हैं।
और हासिल कमाल क्या करते।।
*
तुम तअल्लुक़ निभा नहीं पाये।
हम भी शीशे में बाल क्या करते।।
*
दोस्ती हाट में नहीं मिलती।
इसमें हम देखभाल क्या करते।।
*
मात खाना ही जब ज़रूरी था।
चल के फिर एक चाल क्या करते।।
*
करके कोशिश वो अपनी डूब गये।
टूटी कश्ती के पाल क्या करते।।
*
शेवा ए अम्न ओ आश्ती* वाले।
शग़्ले जंगो जदाल* क्या करते।।
*
तल्ख़ियों* को बयान करना था।
ज़िक्रे हुस्न ए ग़ज़ाल* क्या करते।।
*
सरफिरे आसमान से “अनवर”।
ज़िंदगी का सवाल क्या करते।।
*
ला जवाल*अमर
ख़िज्र* एक अदृश्य बुजर्ग जो भटके हुओं को रास्ता दिखाते हैं
शेवा ए अमन ओ आश्ती* शांतिप्रियता
शग़्ले जंगो जदाल* लड़ाई झगडे का काम
तल्ख़ियों* कड़वाहटों
ज़िक्र ए हुस्न ए ग़ज़ाल*मृग नयनी सौंदर्य का वर्णन

शकूर अनवर
9460851271

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