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Sunday, October 18, 2026
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भूली बिसरी यादें: दुख में भी जोड़ती परंपराएं

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-त्यौहार उठाना 

-मनु वाशिष्ठ

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मनु वशिष्ठ

अभी गांव जाना हुआ और वहां बड़ा ही सुखद यादगार अनुभव रहा, मौका भी त्यौहार उठाने का ही था। शाम को देखा कि घर के बाहर काफी सारे लोग आए हुए थे। परिजनों को भी मालूम था इसलिए उन्होंने भी फर्श/चारपाई/कुर्सियां आदि बिछाकर इंतजाम किया हुआ था। मुझे तो मालूम था लेकिन आजकल के बच्चों को कहां पता होती हैं ये बातें। फिर मैंने बताया कि पुराने समय में ब्रजक्षेत्र में एक रिवाज था कि गांव में वर्षभर में जितने भी लोगों की मृत्यु हो जाती थी तो उन सभी (शोकाकुल) परिवारों के यहां, गांव/ समाज के लोग होली से एक सप्ताह पहले से, त्यौहार उठाने जाते थे। यह वर्षों पुरानी परंपरा है जो कुछ गांवों में आज भी जारी है। जिसमें लोगों और उनकी टोली के सदस्यों द्वारा होली के रसिया, चौपाई, पदों आदि का गायन किया जाता है तथा गुलाल लगाया जाता है। परिवार के द्वारा उचित जलपान करावाया जाता है। इसके बाद ही होली पर, होली और हुरंगा उत्सव शुरू होता है। इसी प्रकार दीवाली पर भी पास पड़ौस द्वारा पीड़ित परिवार के यहां मिठाई वगैरह भेजी जाती है तथा दीपक भी लगाए जाते हैं। यह परंपरा इस बात का संकेत होती है कि हम आपके सुख में ही नहीं दुख में भी साथ हैं। हालांकि शहरीकरण और एकल परिवारों में स्वांत सुखाय जीवन शैली के चलते, सुख भी अपना/दुख भी अपना। बहुत कम होते हैं जो ये रीति रिवाज जानते, निभाते हैं। पुरानी परंपराएं कहीं न कहीं अपनों से जोड़ती हैं।

__ मनु वाशिष्ठ कोटा जंक्शन राजस्थान

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