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Thursday, October 22, 2026
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रितु बराला मामले में कांग्रेस की घेराबंदी: भाजपा से लड़ाई या अपनों से भी चुनौती?

तीन दिन के धरने के बाद भी FIR दर्ज नहीं, डोटासरा-जूली की जोड़ी पर उठे सवाल; राहुल गांधी को राजस्थान कांग्रेस के भीतर की सियासत पर करना होगा मंथन

photo courtesy social media

राहुल गांधी ने जिस डोटासरा-जूली की जोड़ी को राज्यों में कांग्रेस की नंबर वन जोड़ी बताया था, उसके सामने अब अपनी राजनीतिक क्षमता और संगठनात्मक एकजुटता साबित करने की चुनौती है। रितु बराला मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है, यह तो समय बताएगा, लेकिन इस प्रकरण ने राजस्थान कांग्रेस के नेतृत्व और उसकी रणनीति पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

-देवेंद्र यादव-

devendra yadav
देवेन्द्र यादव

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सात घंटे के धरने के बाद दिल्ली के नई दिल्ली पुलिस थाने में पैलेट गन मामले में घायल छात्र साहिल लोचन के प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी। दूसरी ओर, राजस्थान में तीन दिन तक धरना देने के बावजूद कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की जोड़ी रितु बराला मामले में जयपुर पुलिस कमिश्नर कार्यालय में कथित दोषियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं करवा पाई।

आखिर इसकी वजह क्या रही? क्या केंद्र सरकार की ओर से राजस्थान पुलिस पर दबाव था, जिसके कारण पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने से इनकार कर दिया? राजस्थान कांग्रेस के नेता ऐसा ही आरोप लगा रहे हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने प्रदेश कांग्रेस की रणनीति, नेतृत्व और आपसी तालमेल को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

दिल्ली में एफआईआर, राजस्थान में इनकार क्यों?

रितु बराला और दिल्ली पुलिस के बीच कथित विवाद 13 अक्टूबर को हुआ था। घायल छात्र-छात्राओं के मामले में राहुल गांधी ने दिल्ली स्थित अपने आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस के छात्र-छात्राओं के साथ बर्बरता की।

पुलिस की कथित बर्बरता के खिलाफ कार्रवाई के लिए राहुल गांधी ने केरल और राजस्थान के कांग्रेस नेताओं से फोन पर बात की और अपने-अपने राज्यों में इस मामले में मुकदमा दर्ज करवाने को कहा। राजस्थान कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि केरल में मुकदमा दर्ज हो गया, लेकिन राजस्थान पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया।

कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि राजस्थान में भाजपा की सरकार होने और केंद्र में भी भाजपा का शासन होने के कारण ऐसा हुआ। लेकिन इस दलील के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि भाजपा सरकार होने के कारण राजस्थान में मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, तो 21 अगस्त को राहुल गांधी के सात घंटे के धरने के बाद दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन मामले में एफआईआर कैसे दर्ज कर ली? दिल्ली में भी तो भाजपा की ही सरकार है।

इसलिए सवाल केवल भाजपा सरकार और पुलिस की भूमिका का नहीं है। यह भी देखना होगा कि राजस्थान कांग्रेस ने इस मामले को किस रणनीति के तहत उठाया और तीन दिन के धरने के बाद भी उसे अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिला।

क्या राजस्थान कांग्रेस दो मोर्चों पर लड़ रही है लड़ाई?

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजस्थान कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक चल रहा है? क्या प्रदेश कांग्रेस एक ओर सत्ताधारी भाजपा से राजनीतिक लड़ाई लड़ रही है और दूसरी ओर पार्टी के भीतर लंबे समय से प्रभावशाली बने हुए नेताओं के बीच भी खींचतान जारी है?

राहुल गांधी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की जोड़ी को पार्टी के भीतर राज्यों की नंबर वन जोड़ी बताया था। उन्होंने दूसरे राज्यों के नेताओं को भी इस जोड़ी से सीखने की बात कही थी। ऐसे में रितु बराला मामले में तीन दिन के धरने के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं हो पाना इस जोड़ी की राजनीतिक रणनीति और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।

यदि राजस्थान पुलिस ने राजनीतिक दबाव में मुकदमा दर्ज नहीं किया, जैसा कि कांग्रेस नेता आरोप लगा रहे हैं, तो पार्टी को इस आरोप को प्रमाणों के साथ सामने लाना चाहिए। लेकिन यदि मामला रणनीतिक या संगठनात्मक कमजोरी का है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी है।

क्या राहुल गांधी ने गलत नेता को फोन कर दिया?

इस घटनाक्रम से दूसरा सवाल यह उठता है कि क्या राहुल गांधी ने रितु बराला मामले में मुकदमा दर्ज करवाने के लिए राजस्थान में गलत नेतृत्व पर भरोसा किया?

क्या उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बजाय पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से बात करनी चाहिए थी? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अशोक गहलोत धरने के पहले दिन गोविंद सिंह डोटासरा के साथ जयपुर पुलिस कमिश्नर के सामने बैठे दिखाई दिए, लेकिन वे अगले तीन दिन तक धरने पर उनके साथ नजर नहीं आए। गहलोत के समर्थक नेता भी धरने में उसी सक्रियता के साथ शामिल होते दिखाई नहीं दिए।

यह घटनाक्रम अपने आप में कांग्रेस के भीतर राजनीतिक समीकरणों की पड़ताल करने का अवसर देता है। हालांकि, केवल किसी नेता के धरने में शामिल नहीं होने से उसकी मंशा पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन पार्टी की एकजुटता और नेतृत्व के तालमेल को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

गहलोत की नजर 2028 पर, डोटासरा-जूली के सामने नेतृत्व साबित करने की चुनौती

राजस्थान की राजनीति में अशोक गहलोत की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके राजनीतिक रुख और भविष्य की महत्वाकांक्षाओं को लेकर पार्टी के भीतर लगातार चर्चा होती रही है। राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह भी देखना होगा कि 2028 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर प्रदेश कांग्रेस के अलग-अलग नेता किस तरह अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रहे हैं।

गहलोत के समर्थक पूर्व मंत्री शांति कुमार धारीवाल सार्वजनिक रूप से यह कहते रहे हैं कि दिल्ली में हाईकमान कोई भी हो, राजस्थान में हाईकमान अशोक गहलोत ही हैं। ऐसे बयान प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व के सवाल को और प्रासंगिक बना देते हैं।

दूसरी ओर, राहुल गांधी ने डोटासरा और जूली की जोड़ी की सार्वजनिक रूप से सराहना की है। ऐसे में इस जोड़ी के सामने चुनौती केवल भाजपा का मुकाबला करने की नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता, संगठनात्मक पकड़ और नेतृत्व क्षमता को भी साबित करने की है।

रितु बराला मामले में धरने का अपेक्षित नतीजा नहीं निकलना इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। सवाल यह है कि क्या पार्टी के सभी प्रमुख नेता एक साझा रणनीति पर काम कर रहे हैं या प्रदेश कांग्रेस के भीतर अलग-अलग राजनीतिक केंद्र अपनी-अपनी भूमिका तय कर रहे हैं?

डोटासरा के चोटिल होने के बाद धरना स्थगित, आंदोलन का क्या हुआ?

रितु बराला मामले में एफआईआर दर्ज करवाने की मांग को लेकर चल रहे धरने के बीच 21 अक्टूबर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के पैर में चोट लग गई। इसके बाद धरना स्थगित कर दिया गया।

धरना स्थगित होने से आंदोलन का दबाव आगे नहीं बढ़ सका। राजनीतिक दृष्टि से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस के पास धरना समाप्त होने के बाद भी पुलिस पर दबाव बनाए रखने की कोई वैकल्पिक रणनीति थी? क्या पार्टी ने कानूनी विकल्पों पर आगे बढ़ने की तैयारी की थी? या फिर आंदोलन का पूरा दारोमदार केवल धरने पर ही टिका हुआ था?

डोटासरा और जूली की जोड़ी राहुल गांधी की भरोसेमंद नेता रितु बराला को तीन दिन के धरने के बाद भी न्याय दिलाने में सफल नहीं हो पाई। अब यह देखना होगा कि कांग्रेस इस मामले को आगे किस तरह उठाती है और एफआईआर दर्ज करवाने के लिए कौन-से कदम उठाती है।

राहुल गांधी को राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर करना होगा मंथन

राहुल गांधी के सामने राजस्थान कांग्रेस को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी भाजपा के खिलाफ अपनी राजनीतिक लड़ाई को प्रभावी बनाने में कहां चूक रही है। क्या समस्या राज्य सरकार और पुलिस के रवैये में है, जैसा कि कांग्रेस नेता आरोप लगा रहे हैं, या फिर पार्टी के भीतर नेतृत्व, रणनीति और तालमेल की भी कोई समस्या है?

राजस्थान कांग्रेस के नेताओं के लिए यह कह देना आसान हो सकता है कि भाजपा की सरकार होने के कारण मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। लेकिन दिल्ली में भी भाजपा की सरकार थी और वहां राहुल गांधी के धरने के बाद एफआईआर दर्ज हुई थी। ऐसे में केवल सरकार के राजनीतिक रंग को कारण बताना पूरे घटनाक्रम की व्याख्या नहीं करता।

राहुल गांधी ने जिस डोटासरा-जूली की जोड़ी को राज्यों में कांग्रेस की नंबर वन जोड़ी बताया था, उसके सामने अब अपनी राजनीतिक क्षमता और संगठनात्मक एकजुटता साबित करने की चुनौती है। रितु बराला मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है, यह तो समय बताएगा, लेकिन इस प्रकरण ने राजस्थान कांग्रेस के नेतृत्व और उसकी रणनीति पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

अब राहुल गांधी को यह समझने के लिए गंभीर मंथन करना होगा कि राजस्थान कांग्रेस में वास्तव में चल क्या रहा है। पार्टी की लड़ाई केवल भाजपा की सरकार से है या उसे अपने भीतर के राजनीतिक समीकरणों और नेतृत्व की चुनौतियों से भी एक साथ निपटना है? यही सवाल राजस्थान कांग्रेस की आगे की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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