
-राजेंद्र पाल गौतम के सामने चुनौती: क्षेत्रीय दलों से सम्मानजनक समझौता कर कांग्रेस को बड़े भाई की भूमिका में वापस लाना
-देवेंद्र यादव-

यदि क्षेत्रीय दल कांग्रेस का बड़ा दिल देखना चाहते हैं, तो उन्हें कांग्रेस को एक बड़े राजनीतिक दल के रूप में स्वीकार करना भी सीखना होगा। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम आगामी विधानसभा चुनाव के लिए शायद इसी राजनीतिक फार्मूले पर काम कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करे, लेकिन समझौते की कीमत अपनी राजनीतिक जमीन गंवाकर न चुकाए।
कांग्रेस ने देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करते हुए कई बार बड़ा दिल दिखाया। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस की इस उदारता का उसे कितना राजनीतिक लाभ मिला? उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा ऐसे राज्य हैं, जहां कभी कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थीं। आज इन राज्यों में कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कभी कांग्रेस का मजबूत जनाधार रहा, लेकिन धीरे-धीरे क्षेत्रीय दलों ने उस राजनीतिक जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
कांग्रेस की राजनीतिक जमीन पर क्षेत्रीय दलों ने खड़ी की अपनी ताकत
इन राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में भारतीय जनता पार्टी की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन कांग्रेस के पतन की कहानी केवल भाजपा के उदय से नहीं जुड़ी है। क्षेत्रीय दलों के उभार ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई। इन दलों ने कांग्रेस के पारंपरिक जनाधार के बीच अपनी राजनीतिक पैठ बनाई और धीरे-धीरे कांग्रेस के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपनी ताकत बढ़ाई।
कांग्रेस लंबे समय तक गठबंधन की राजनीति में बड़े भाई की भूमिका निभाती रही। उसने कई बार क्षेत्रीय दलों को अधिक राजनीतिक जगह दी और अपने हिस्से की सीटों पर समझौता किया। लेकिन जिन क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस की राजनीतिक जमीन से विस्तार का अवसर मिला, वे समय के साथ इतने मजबूत हो गए कि कांग्रेस को ही चुनौती देने लगे।
राजनीति में परिवार के झगड़े का फायदा तीसरे पक्ष को मिलने की कहावत यहां भी चरितार्थ होती दिखाई देती है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तथा आपसी खींचतान ने भाजपा को भी कई राज्यों में अपना आधार मजबूत करने का अवसर दिया। हालांकि इन राज्यों में सत्ता परिवर्तन के कारण अलग-अलग रहे हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि विपक्षी दलों के बीच बिखराव ने भाजपा की राह आसान की।
समझौते की राजनीति ने कांग्रेस को कितना कमजोर किया?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस उन राज्यों में क्षेत्रीय दलों के सामने बार-बार झुकती क्यों रही, जहां उसका संगठन लगातार कमजोर हो रहा था? क्या गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस ने अपनी दीर्घकालिक राजनीतिक संभावनाओं की तुलना में तत्काल चुनावी लाभ को अधिक महत्व दिया?
इसका एक संभावित कारण राज्यों में पार्टी की रणनीति तय करने वाले नेतृत्व की भूमिका भी हो सकती है। कांग्रेस हाईकमान ने अलग-अलग राज्यों में जिन नेताओं को प्रभारी बनाकर जिम्मेदारी सौंपी, क्या वे पार्टी के संगठन विस्तार और चुनावी रणनीति को मजबूत करने में सफल रहे? या फिर गठबंधन बनाए रखने के लिए समझौते करना ही उनकी प्राथमिकता बन गया?
किसी भी गठबंधन में समझौता राजनीतिक जरूरत होता है, लेकिन समझौता और आत्मसमर्पण के बीच अंतर है। यदि कोई पार्टी लगातार अपनी सीटें, संगठनात्मक प्रभाव और राजनीतिक महत्व छोड़ती चली जाए, तो सहयोगी दल के मजबूत होने के साथ उसका अपना आधार कमजोर पड़ सकता है। कांग्रेस के सामने कई राज्यों में यही चुनौती रही है।
उत्तर प्रदेश में राजेंद्र पाल गौतम का नया प्रयोग
उत्तर प्रदेश में अब कांग्रेस की रणनीति में बदलाव के संकेत दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। राहुल गांधी ने राजेंद्र पाल गौतम को प्रदेश का राष्ट्रीय प्रभारी बनाकर भेजा है। उनके सामने चुनौती केवल समाजवादी पार्टी के साथ सीटों का बंटवारा करना नहीं, बल्कि कांग्रेस संगठन को फिर से मजबूत करना और कार्यकर्ताओं में राजनीतिक विश्वास पैदा करना भी है।
गौतम ने अपनी रणनीति के तहत कांग्रेस के बिखरे हुए संगठन को समेटने और विभिन्न सामाजिक वर्गों के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ने पर जोर दिया है। ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम, पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों के बीच कांग्रेस की राजनीतिक पहुंच बढ़ाना इस प्रयास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चार दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर है। लंबे राजनीतिक वनवास ने पार्टी के संगठन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित किया है। ऐसे में कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, उन्हें जिम्मेदारियां देना और सत्ता में वापसी की उम्मीद जगाना किसी भी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है।
राजेंद्र पाल गौतम के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली, कांग्रेस के संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना और दूसरी, समाजवादी पार्टी के साथ ऐसा राजनीतिक समझौता करना, जिसमें कांग्रेस को अपनी ताकत के अनुरूप हिस्सेदारी मिले।
2024 के लोकसभा चुनाव ने दिया कांग्रेस को नया आत्मविश्वास
उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों के बंटवारे की बहस को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की। इन नतीजों ने उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने विपक्षी गठबंधन की ताकत भी प्रदर्शित की।
कांग्रेस का तर्क हो सकता है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने संविधान, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर जो राजनीतिक माहौल बनाया, उससे विपक्षी गठबंधन को व्यापक लाभ मिला। समाजवादी पार्टी को अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर मिला और उसने अपनी मजबूत क्षेत्रीय उपस्थिति के आधार पर बेहतर प्रदर्शन किया।
हालांकि यह कहना मुश्किल है कि यदि दोनों दल बराबर सीटों पर चुनाव लड़ते तो कांग्रेस कितनी सीटें जीतती। चुनाव परिणाम उम्मीदवारों, क्षेत्रीय समीकरणों, संगठन और स्थानीय मुद्दों पर भी निर्भर करते हैं। फिर भी 2024 के चुनाव ने कांग्रेस को यह दावा करने का आधार दिया है कि उत्तर प्रदेश में उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता पहले से अधिक है और उसे गठबंधन में अपनी भूमिका नए सिरे से तय करनी चाहिए।
कांग्रेस के लिए चुनौती इस बदले हुए राजनीतिक माहौल को विधानसभा चुनाव तक बनाए रखने की है। लोकसभा चुनाव के परिणाम विधानसभा चुनाव में स्वतः दोहराए जाएं, यह जरूरी नहीं है। इसलिए कांग्रेस को अपने संगठन और स्थानीय नेतृत्व की ताकत भी साबित करनी होगी।
समाजवादी पार्टी से सम्मानजनक समझौते की चुनौती
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन बनाए रखना चाहती है, लेकिन उसकी कोशिश यह भी हो सकती है कि सीटों के बंटवारे में उसे पहले की तुलना में अधिक सम्मानजनक हिस्सेदारी मिले।
राजेंद्र पाल गौतम की रणनीति की असली परीक्षा इसी मोर्चे पर होगी। यदि कांग्रेस केवल गठबंधन के नाम पर कम सीटों पर समझौता करती है, तो कार्यकर्ताओं के बीच पैदा हुआ नया उत्साह कमजोर पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि वह अपनी चुनावी क्षमता से अधिक सीटों की मांग करती है, तो गठबंधन के भीतर तनाव बढ़ने का खतरा भी रहेगा।
इसलिए कांग्रेस के लिए जरूरी है कि वह सीटों की मांग के साथ-साथ अपने संगठन, संभावित उम्मीदवारों, क्षेत्रवार जनाधार और चुनावी प्रदर्शन के आधार पर अपनी दावेदारी मजबूत करे।
कांग्रेस के सामने अब सवाल केवल यह नहीं है कि वह समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करेगी या नहीं, बल्कि यह है कि गठबंधन में उसकी हैसियत क्या होगी।
बड़ा दिल दिखाने के साथ बड़ी पार्टी बनने की भी जरूरत
राजेंद्र पाल गौतम की रणनीति का महत्व इसी बात में है कि कांग्रेस गठबंधन की राजनीति से बाहर निकलने के बजाय उसके भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने का प्रयास करे। क्षेत्रीय दलों के साथ सहयोग जरूरी हो सकता है, लेकिन कांग्रेस को अपनी स्वतंत्र पहचान, संगठन और चुनावी क्षमता भी विकसित करनी होगी।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को यदि फिर से मजबूत होना है, तो उसे केवल राहुल गांधी के राजनीतिक प्रभाव या विपक्षी एकजुटता के भरोसे नहीं रहना चाहिए। उसे स्थानीय नेतृत्व तैयार करना होगा, कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना होगा और उन सामाजिक वर्गों के बीच अपना विश्वास बहाल करना होगा, जो कभी उसके मजबूत समर्थक हुआ करते थे।
राजेंद्र पाल गौतम के लिए असली सफलता तब मानी जाएगी, जब कांग्रेस सम्मानजनक सीटें हासिल करने के साथ अपने वोट आधार और संगठन का विस्तार भी कर सके। क्योंकि गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका केवल अधिक सीटें मांगने से नहीं मिलती, बल्कि संगठनात्मक ताकत और चुनावी प्रदर्शन से हासिल होती है।
आखिरकार, कांग्रेस को यह समझना होगा कि बड़ा दिल दिखाना अच्छी राजनीतिक पहल है, लेकिन अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। उत्तर प्रदेश में राजेंद्र पाल गौतम की रणनीति कितनी सफल होगी, इसका फैसला आगामी विधानसभा चुनाव में ही होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)


















