26.5 C
Kota
Tuesday, October 27, 2026
Home My Views मुस्कुराहट, मिलनसारिता और क्रिकेट के जुनून का नाम थे दिनकर पाठक

मुस्कुराहट, मिलनसारिता और क्रिकेट के जुनून का नाम थे दिनकर पाठक

दिनकर पाठक मैदान तैयार कराने से लेकर अंपायरिंग और स्कोरर तक की भूमिका वे खुद निभाने से नहीं हिचकते थे। यानी आयोजन के पीछे उनका समय, मेहनत और क्रिकेट के प्रति समर्पण लगा रहता था।

दिनकर-पाठक।-फोटो-गोपाल-श्रृंगी-की-फेसबुक-वॉल-से-साभार।

-यादों में हमेशा जिंदा रहेगा गर्मजोशी से हाथ मिलाना और पूछना ‘शैलेश, कैसा है?’

-शैलेश पाण्डेय-

मुस्कुराता चेहरा और मिलनसार स्वभाव किसी का भी दिल जीत सकता है। इसमें खर्च कुछ नहीं होता, लेकिन इसका असर ताउम्र याद रहता है। इसका बेहतरीन उदाहरण रहे हैं हमारे दिनकर पाठक। जीवन में क्रिकेटर, टूर्नामेंट आयोजक, अंपायर और खेल पत्रकार जैसी कई भूमिकाएं निभाने वाले दिनकर पाठक अपनी पारी पूरी कर अनंत में विलीन हो गए। लेकिन उनका मुस्कुराते हुए गर्मजोशी से हाथ मिलाना और कहीं नजर पड़ते ही अपनेपन से पूछना ‘शैलेश, कैसा है?’ हमेशा याद रहेगा। कुछ लोग अपनी उपलब्धियों से पहचान बनाते हैं, तो कुछ अपने व्यवहार से दिलों में जगह बना लेते हैं। दिनकर पाठक ऐसे ही इंसान थे।

उनसे मेरा शुरुआती परिचय पारिवारिक था। मेरी मां सुमन पाण्डेय ने अपने कॅरियर की शुरुआत दिनकर पाठक के पिता और महान शिक्षाविद् सदाशिव पाठक द्वारा संचालित सरस्वती विद्यापीठ से की थी। दिनकर मेरी मां को दीदी कहते थे और इसी अधिकार के साथ मेरे साथ भी व्यवहार करते थे। जब भी मुलाकात होती, मां सुमन दीदी के बारे में जरूर पूछते। उनके इस व्यवहार में औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मीयता झलकती थी। वक्त के साथ परिचय बढ़ा तो उनके व्यक्तित्व के कई और पहलुओं को करीब से जानने का मौका मिला।
क्रिकेट का जुनून
दिनकर पाठक का क्रिकेट से रिश्ता केवल एक खिलाड़ी तक सीमित नहीं था। इस खेल के प्रति उनका जुनून ऐसा था कि उन्होंने अपने पिता के निधन के बाद उनकी स्मृति में कई वर्षों तक शानदार क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित किया। उस दौर में यह आयोजन काफी प्रतिष्ठित हुआ करता था। इसकी जिम्मेदारी लगभग अकेले दिनकर पाठक ही संभालते थे। मैदान तैयार कराने से लेकर अंपायरिंग और स्कोरर तक की भूमिका वे खुद निभाने से नहीं हिचकते थे। यानी आयोजन के पीछे उनका समय, मेहनत और क्रिकेट के प्रति समर्पण लगा रहता था।

उस टूर्नामेंट में मॉडर्न स्कूल, जेके, न्यू फ्रेंड्स जैसी उस समय की कई प्रमुख टीमें हिस्सा लेती थीं। मुकाबलों को लेकर खिलाड़ियों में उत्साह और क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह आयोजन खास था। बाद में खर्च अत्यधिक बढ़ जाने के कारण उन्हें टूर्नामेंट बंद करना पड़ा, लेकिन उस दौर के क्रिकेटर आज भी उसे याद करते हैं।

इस टूर्नामेंट की एक और खासियत थी। इसने ऐसे कई युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका दिया, जिन्हें उस समय की प्रमुख टीमें तवज्जो तक नहीं देती थीं। उनके लिए यह टूर्नामेंट अपनी पहचान बनाने का मंच बना। दिनकर पाठक ने क्रिकेट के प्रति अपने जुनून को केवल खेल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि नए खिलाड़ियों को अवसर देने का माध्यम भी बनाया। वह खुद अपनी टीम बनाकर इस टूर्नामेंट में उतारते थे जिसमें इन युवा खिलाडियों को जगह मिलती थी। यह उनके व्यक्तित्व का ऐसा पहलू था, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
जब मेरी रिपोर्ट को बेहतर बनाने में जुट जाते थे दिनकर
दिनकर पाठक ने राष्ट्रदूत में खेल संवाददाता के तौर पर भी काम किया। इस दौरान हमें कोटा में आयोजित कई बड़े टूर्नामेंट साथ में कवर करने का मौका मिला। उन दिनों की यादें आज भी ताजा हैं। वे अक्सर मेरे साथ ही रहते थे और आयोजन से जुड़ी ज्यादातर जानकारियां जुटाने की जिम्मेदारी उन्हीं की होती थी। कई बार तो ऐसा लगता था, मानो वे चाहते हों कि मेरी रिपोर्ट सबसे अच्छी हो। वे जिस तरह जानकारियां जुटाते और उनका ब्योरा देते थे, उससे उनकी खेल के प्रति समझ और पत्रकारिता के प्रति गंभीरता दोनों का पता चलता था।

इसका एक उदाहरण कोटा में आयोजित विल्स ट्रॉफी का मैच है। उस समय आयोजकों की ओर से बाहर से आए पत्रकारों को ज्यादा तवज्जो दी जा रही थी, जबकि स्थानीय पत्रकारों को मामूली जानकारी जुटाने के लिए भी भटकना पड़ रहा था। ऐसी स्थिति में दिनकर पाठक ने अपने क्रिकेट, अंपायरिंग और स्कोरिंग से जुड़े तमाम संपर्कों का भरपूर इस्तेमाल किया। उन्होंने जरूरी जानकारियां जुटाने में मेरी मदद की। इसका नतीजा यह रहा कि राजस्थान पत्रिका में मैच की मेरी रिपोर्ट शानदार रही। तत्कालीन डेस्क प्रभारी सुकुमार वर्मा इस रिपोर्ट से इतने प्रभावित हुए कि इसके बाद मुझे खुलकर रिपोर्टिंग करने का मौका मिला।

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो उस रिपोर्ट की सफलता में दिनकर पाठक के योगदान को भुला नहीं सकता। वे सहज भाव से साथ देते थे। शायद यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी। किसी साथी की सफलता में अपना योगदान देखकर खुश होना हर किसी के स्वभाव में नहीं होता, लेकिन दिनकर ऐसे ही थे।

मुलाकातें कम हुईं, लेकिन अपनापन कभी कम नहीं हुआ
पारिवारिक कारणों से दिनकर पाठक पत्रकारिता में अधिक समय तक सक्रिय नहीं रह सके। वे अपने पिता द्वारा शुरू किए गए शिक्षण संस्थान से पूरी तरह जुड़ गए। इसके बाद पत्रकारिता के सिलसिले में साथ रहने के अवसर कम हो गए, लेकिन बीच-बीच में मुलाकात होती रही। हर बार वही मुस्कुराहट, वही गर्मजोशी और वही आत्मीयता देखने को मिलती थी। उनके व्यवहार में कभी कोई बदलाव नहीं आया।

फिर जीवन की अपनी व्यस्तताएं रहीं। मैं करीब 20 साल तक कोटा से बाहर रहा और इस दौरान हमारा संपर्क टूट गया। कोटा लौटने के बाद बीच में एक-दो बार मुलाकात हुई। उन मुलाकातों में भी वही पुराना अपनापन था, जैसे वक्त ने हमारे बीच कोई दूरी पैदा ही नहीं की हो।

कल अचानक क्रिकेटर गोपाल श्रृंगी से दिनकर पाठक के निधन की सूचना मिली। यह खबर सुनकर दुख और अफसोस तो हुआ ही, साथ में पुरानी स्मृतियां भी लौट आईं। आंखों के सामने उनका मुस्कुराता चेहरा और गर्मजोशी से हाथ मिलाने का अंदाज घूम गया। लगा, जैसे अभी कहीं सामने से आएंगे और उसी अपनेपन से पूछेंगे—‘शैलेश, कैसा है?’

जिंदगी की यही तो विडंबना है। कुछ लोग अचानक यादों का हिस्सा बन जाते हैं और फिर उनकी कमी हमेशा खलती रहती है। दिनकर पाठक का जाना सिर्फ एक पुराने परिचित का बिछुड़ना नहीं है। यह उस दौर की स्मृतियों का फिर से जीवंत हो उठना भी है, जब क्रिकेट, पत्रकारिता और आपसी सहयोग के बीच रिश्ते बनते थे। ईश्वर उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दे। मेरी कामना है कि वे वहां भी अपनी मुस्कुराहट बिखेरते रहें। अलविदा दिनकर भाई! आपकी मुस्कुराहट और अपनापन हमेशा याद आएगा।

Advertisement