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Thursday, October 15, 2026
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इसीलिए तो ये नींदें हुई हैं मेरे खिलाफ कि मेरी आंखों में क्यूं ख़्वाब पलते जाते हैं

ग़ज़ल

– अहमद सिराज फारूकी-

ahamad siraj faroqi
अहमद सिराज फारूकी

गुलाब चेहरे भी पत्थर में ढलते जाते हैं
वो देखो धूप के अरमां निकलते जाते हैं

पलट के देखा जो हमने तो ये खुला हम पर
सफर वही है मुसाफ़िर बदलते जाते हैं

इसीलिए तो ये नींदें हुई हैं मेरे खिलाफ
कि मेरी आंखों में क्यूं ख़्वाब पलते जाते हैं

वो चढ़ रहा है पहाड़ों की चोटियों पे मगर
क़दम ज़मीन की जानिब फिसलते जाते हैं

कहीं तो होगी मुलाक़ात बिछड़े लोगों से
इसी ख़याल इसी धुन में चलते जाते हैं

वो बेदिमाग़ है लेकिन है अपना मीर सिराज
सो उस के रंग में अब हम भी ढलते जाते हैं

1- जानिब- तरफ
2- बेदिमाग़- नाज़ुक मिज़ाज, जल्द नाराज हो जाने वाला, खिन्न, सरफिरा
(मीर तक़ी मीर ने अपने एक शेर में ख़ुद के लिए इसे किया है)
3-मीर- मीर तक़ी मीर ने अपने एक शेर में ख़ुद के लिए इसे इस्तेमाल किया है
( शाब्दिक अर्थ- सरदार, पथ प्रदर्शक, सालार आदि)

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