29.5 C
Kota
Thursday, October 15, 2026
Home Literature उलझ रहा हूंँ नई मंज़िलों की राहों में। क़दम क़दम पे नया...

उलझ रहा हूंँ नई मंज़िलों की राहों में। क़दम क़दम पे नया इम्तेहान रखता हूंँ।।

shakoor anwar
शकूर अनवर

ग़ज़ल

-शकूर अनवर-

हर एक सम्त* खुला आसमान रखता हूँ।
कहाँ हूँ देखिये कैसी उड़ान रखता हूँ।।
*
बयाने-ग़म* के लिये ही ज़ुबान रखता हूँ।
मैं अपनी फ़िक्र को हरदम जवान* रखता हूँ।।

गिरफ़्त मेरे क़लम की ज़मीं से ता ब फ़लक*।
नज़र में अपनी मैं दोनों जहान रखता हूँ।।
*
उलझ रहा हूंँ नई मंज़िलों की राहों में।
क़दम क़दम पे नया इम्तेहान रखता हूंँ।।
*
न आओ पास भी इतने कि टूट जायेंगे।
वो फ़ासले मैं जिन्हें दरमियान रखता हूंँ।।
*
मैं हादिसाते-सफ़र* से हूँ आशना* “अनवर”।
इसीलिये तो हथेली पे जान रखता हूंँ।।
*

सम्त*दिशा
बयाने-ग़म*दुखों का वर्णन
ज़ुबान*भाषा
फ़िक्र* चिंतन
गिरफ़्त*पकड़
ता ब फलक*आसमान तक
हादिसाते-सफ़र*यात्रा में होने वाली दुर्घटनाएँ
आशना*परिचित

शकूर अनवर
9460851271

Advertisement