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Friday, October 16, 2026
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ज़माने के दर्द के आगे अपना दर्द भला कहां ठहरता

– विवेक कुमार मिश्र-

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डॉ. विवेक कुमार मिश्र

ठंड और गलन कुछ इस तरह कि
हड्डियां भी कड़कने लगती हैं
जब ठंड हड्डियों में प्रवेश करने लगे
तो आदमी का दर्द फूट पड़ता है
और हाड़ कंपाती ठंड कड़ – कड़ बोलती है
हड्डियों का बोलना
सचमुच में दर्द का हद से ज्यादा गुजरना हो जाता
इन दिनों कुछ इसी तरह हड्डियां कड़क रही हैं
पड़े – पड़े अपनी जगह पर कराह रही हैं
हड्डियां हैं ठंड से कड़क और कराह रही हैं ।

ठंड में आह मत भर
इस समय कड़कड़ाती ठंड में
हड्डियों की कड़ – कड़ महसूस कर
हाय – हाय मत कर
दर्द बस इतना ही नहीं है कि
तुमने कहा और लिखा कि दर्द है
और दर्द चल पड़ा
दर्द तो भरा पड़ा है
थोड़ा आसपास झांक कर देख लें

ज़माने की सड़क पर घूम लें
गलियों से होते हुए मुहल्ले और चौराहों को देख लें

दर्द के हजार रंग और रूप मिल जायेंगे
बिना कुछ कहे दर्द इस तरह पसरा पड़ा है कि
ठंड से कांप रही उंगलियों का दर्द
दिखता भी नहीं
स्पर्श भी नहीं करता

ज़माने के दर्द के आगे अपना दर्द भला कहां ठहरता
इस दर्द भरी दुनिया की दूरियां इतनी
कि चलते चलते सदियां बीत जाएं ।

– विवेक कुमार मिश्र

(सह आचार्य हिंदी राजकीय कला महाविद्यालय कोटा)
F-9, समृद्धि नगर स्पेशल , बारां रोड , कोटा -324002(राज.)

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