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Thursday, October 15, 2026
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बिछड़ने वाले कभी लौट कर नहीं आते, करे तो करता रहे उनका इंतज़ार कोई

akhileshji
फोटो साभार अखिलेश कुमार

ग़ज़ल

-अहमद सिराज फारूकी-

ahamad siraj faroqi
अहमद सिराज फारूकी

ना क़ाफ़िला है सफ़र में ना शहसवार कोई
उड़ा रहा है हवा में मगर ग़ुबार कोई

वो हौसलों के सफ़ीने तो कब के ग़र्क़ हुए
चला है फिर भी समन्दर को करने पार कोई

बिछड़ने वाले कभी लौट कर नहीं आते
करे तो करता रहे उनका इंतज़ार कोई

लगेगा वक़्त तबीअत बहाल होने में
गया है कर के अभी मुझ को बेक़रार कोई

वही पहाड़ है, तेशा है और मैं हूं मगर
ना जू-ए-शीर ही निकली न आबशार कोई

सुलगती धूप लगाने लगी सदा मुझ को
सफ़र में जब भी मिला पेड़ सायादार कोई

इसी उमीद पे बैठे हैं इस चमन में ‘सिराज’
कभी तो आएगा लेकर यहां बहार कोई
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1-शहसवार- घुड़सवार
2- ग़ुबार- धूल
3- सफ़ीने- कश्तियां
4- तेशा- बसूला
5-जू-ए-शीर- दूध की नदी
(शीरीं-फरहाद के किस्से से संबंधित)
6-आबशार- झरना

-अहमद सिराज फारूकी

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