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Friday, October 16, 2026
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कर्नाटक में डीके शिवकुमार का दांव और कांग्रेस के लिए बड़ा संदेश

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photo courtesy social media

-राज्यसभा जीत से राहुल गांधी को ‘जन्मदिन का तोहफा’

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

“हमने चाहा ही नहीं घर में उजाला करना, वरना सूरज को भी आंगन में उतार लाते।”
कर्नाटक के नवनियुक्त मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवारों को जिताकर मानो इस पंक्ति को राजनीतिक अर्थ दे दिया। 2014 के बाद से राष्ट्रीय राजनीति में अक्सर भाजपा और उसके ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले अमित शाह की रणनीति की चर्चा होती रही है। वजह भी साफ रही—विपक्ष के विधायक और सांसद टूटकर भाजपा में शामिल होते रहे और भाजपा लगातार अपनी राजनीतिक बढ़त मजबूत करती रही।

लेकिन कर्नाटक में तस्वीर कुछ अलग दिखी। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के कुछ ही दिनों बाद डीके शिवकुमार ने राज्यसभा चुनाव में भाजपा की रणनीति को मात देते हुए कांग्रेस उम्मीदवार को जीत दिलाई। इस जीत को राहुल गांधी के लिए 19 जून के जन्मदिन पर एक बड़े राजनीतिक तोहफे के रूप में देखा जा सकता है—ऐसा तोहफा, जिसका इंतजार कांग्रेस नेतृत्व को लंबे समय से था।

क्या कांग्रेस ने कर्नाटक मॉडल देर से अपनाया?

कर्नाटक में कांग्रेस ने सत्ता और संगठन—दोनों स्तरों पर बड़ा फेरबदल किया। डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया और बीके हरिप्रसाद को प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान सौंपी गई। अब इसके शुरुआती परिणाम सामने आते दिखाई दे रहे हैं। यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या कांग्रेस ने अन्य राज्यों में ऐसा प्रयोग समय रहते किया होता, तो भाजपा इतनी मजबूत हो पाती?

अगर 2014 के बाद कांग्रेस ने कर्नाटक की तरह दूसरे राज्यों में भी संगठन और नेतृत्व में निर्णायक बदलाव किए होते, तो शायद राजनीतिक परिदृश्य कुछ और होता। कांग्रेस के पास तब भी कई राज्यों में मजबूत नेता थे और आज भी हैं, लेकिन उन्हें डीके शिवकुमार और बीके हरिप्रसाद जैसी भूमिका और अवसर नहीं मिल पाए। यही वजह है कि कांग्रेस कई राज्यों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी।

राजस्थान से पंजाब तक जहां कांग्रेस ने मौके गंवाए

राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और असम जैसे राज्य इसके बड़े उदाहरण हैं। इन राज्यों में कांग्रेस के पास सत्ता में वापसी करने या सत्ता बनाए रखने का अवसर था, लेकिन पार्टी के भीतर भरोसे और नेतृत्व को लेकर बनी दुविधा ने उसे पीछे धकेल दिया। कई जगह कांग्रेस जीती हुई बाजी भी हारती चली गई।

स्थिति यहां तक पहुंची कि जिन नेताओं को कांग्रेस ने पर्याप्त अवसर नहीं दिया, वे भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें जगह दी, अवसर दिया और उन्हीं नेताओं के सहारे कई राज्यों में अपनी ताकत बढ़ा ली। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस कमजोर होती गई और भाजपा केंद्र में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रही।

2029 से पहले क्या राहुल गांधी करेंगे बड़ा प्रयोग?

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले कर्नाटक की तर्ज पर दूसरे राज्यों में भी बड़ा संगठनात्मक और राजनीतिक बदलाव करेंगे? यह सवाल लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में तैरता रहा है, लेकिन इसका स्पष्ट जवाब अभी तक नहीं मिला है।

राहुल गांधी के सामने चुनौती सिर्फ भाजपा से लड़ने की नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, संगठन और अवसरों के नए संतुलन को गढ़ने की भी है। कर्नाटक ने यह संकेत जरूर दिया है कि यदि पार्टी सही नेता को सही समय पर सही जिम्मेदारी दे, तो वह भाजपा की सबसे मजबूत रणनीति को भी चुनौती दे सकती है।

विपक्ष की टूट—हार या कोई नई रणनीति?

इन दिनों राजनीतिक गलियारों और मीडिया में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों के भाजपा में जाने, तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के नई राजनीतिक संभावनाओं की ओर बढ़ने, और शिवसेना व समाजवादी पार्टी के कुछ सांसदों के भाजपा के संपर्क में होने की चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे विपक्ष की कमजोरी और भाजपा की रणनीतिक सफलता के रूप में देख रहे हैं।

लेकिन क्या यह पूरी कहानी है? क्या यह भी संभव है कि विपक्ष अपनी कोई अलग रणनीति बुन रहा हो और भाजपा को उसी के खेल में उलझाने की कोशिश कर रहा हो? शायद यही वजह है कि भाजपा विपक्ष से आने वाले कई नेताओं को सीधे अपने दल में शामिल करने के बजाय उन्हें एनडीए के घटक दलों के जरिए साधने की कोशिश कर रही है। यह एक अलग राजनीतिक विमर्श है, जिस पर विस्तार से अलग चर्चा की जा सकती है।

कर्नाटक से निकला कांग्रेस के लिए संकेत

फिलहाल इतना तय है कि कर्नाटक में डीके शिवकुमार ने भाजपा को उसी की राजनीतिक भाषा में जवाब दिया है। उन्होंने यह संदेश दिया है कि कांग्रेस अगर चाहे, तो अपने घर में उजाला कर सकती है; सवाल सिर्फ इच्छा, निर्णय और भरोसे का है।

कर्नाटक का यह प्रयोग कांग्रेस के लिए सिर्फ एक राज्यसभा जीत नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संकेत है—कि मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट रणनीति और संगठनात्मक भरोसे के साथ भाजपा की बढ़त को रोका भी जा सकता है और चुनौती भी दी जा सकती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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