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Saturday, October 17, 2026
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क्या जनता कांग्रेस को जिताना चाहती है, लेकिन नेता जीतना नहीं चाहते!

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photo courtesy social media

-समय से पहले मुख्यमंत्री की दौड़ कहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी तो नहीं?

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

कांग्रेस के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जनता तो कांग्रेस को जिताना चाहती है, लेकिन कांग्रेस के नेता जीतना नहीं चाहते? 2014 में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद से यह स्थिति लगातार देखने को मिलती रही है। 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की। राजस्थान में कांग्रेस पहले भी सत्ता में रह चुकी थी, लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसने लंबे समय बाद सरकार बनाई। इसके बावजूद मध्य प्रदेश में कांग्रेस अपनी सरकार केवल एक वर्ष ही चला सकी। पार्टी के भीतर विद्रोह हुआ और सत्ता उसके हाथ से निकल गई।

कुर्सी को लेकर नेताओं के बीच तनाव राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिला। हालांकि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनी रहीं, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। छत्तीसगढ़ में भी पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा। 2023 के विधानसभा चुनावों में भी माना गया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जनता कांग्रेस को अवसर देना चाहती थी। लेकिन नेताओं के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर चली खींचतान ने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से सत्ता छीन ली, जबकि मध्य प्रदेश में पार्टी सत्ता में वापसी नहीं कर सकी।

यदि पंजाब, हरियाणा सहित अन्य राज्यों की बात करें तो वहां भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति देखने को मिली। कई बार ऐसा लगा कि जनता कांग्रेस को सत्ता में लाना चाहती है, लेकिन पार्टी के अंदरूनी मतभेद और नेतृत्व संघर्ष ने जीत को हार में बदल दिया।

क्या समय से पहले शुरू हो जाती है मुख्यमंत्री की दौड़?

बड़ा सवाल यह है कि आखिर इसकी वजह क्या है? क्या कांग्रेस के नेता समय से पहले ही ख्याली पुलाव पकाने लगते हैं? क्या वे चुनावी रणनीति से भटककर भाजपा के रणनीतिकारों के जाल में फंस जाते हैं?

जब राजनीतिक गलियारों और मीडिया में यह चर्चा शुरू होती है कि चुनावी राज्यों में भाजपा की स्थिति कमजोर है और कांग्रेस सत्ता में लौट सकती है, तब कांग्रेस के कई नेता इसी धारणा को अंतिम सत्य मान बैठते हैं। इसके बाद चुनाव जीतने की रणनीति बनाने के बजाय मुख्यमंत्री बनने की रणनीति पर अधिक ध्यान देने लगते हैं।

मुख्यमंत्री पद की इस होड़ का असर टिकट वितरण तक दिखाई देता है। कई बार उम्मीदवारों के चयन में ऐसी गलतियां हो जाती हैं, जिनका खामियाजा पूरे संगठन को चुनावी हार के रूप में भुगतना पड़ता है।

राजस्थान में अभी से शुरू हुई सियासी हलचल

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2028 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं। राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर अभी से राजनीतिक हलचल तेज होती दिखाई दे रही है।

राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को लेकर सक्रिय नजर आ रहे हैं। उनके समर्थक लगातार यह संदेश देने में जुटे हैं कि प्रदेश में सबसे बड़े नेता अशोक गहलोत ही हैं। यहां तक कि “चौथी बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत” जैसे नारे भी सुनाई देने लगे हैं।

निस्संदेह अशोक गहलोत राजस्थान के प्रमुख नेताओं में हैं, लेकिन प्रदेश में आधा दर्जन से अधिक ऐसे नेता भी हैं जिनका राजनीतिक प्रभाव कम नहीं माना जाता। अनुभव यह भी बताता है कि जब कांग्रेस के सभी बड़े नेता एकजुट होकर चुनाव लड़ते हैं, तभी पार्टी राजस्थान में सत्ता तक पहुंचती है।

राहुल गांधी की रणनीति और प्रदेश नेताओं की प्राथमिकता

एक ओर राहुल गांधी 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर करने की रणनीति बनाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर राजस्थान के कुछ कांग्रेस नेता अभी से इस गणित में लगे दिखाई दे रहे हैं कि यदि 2028 में कांग्रेस सत्ता में आती है तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा।

यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।

भाजपा और कांग्रेस की रणनीति में अंतर

राजस्थान में मौजूदा भाजपा सरकार भी कई चुनौतियों का सामना कर रही है। भाजपा के भीतर भी मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार हैं। लेकिन जब संगठन और सत्ता बचाने की बात आती है तो पार्टी के नेता आमतौर पर पहले चुनाव जीतने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। सरकार बचाने या सत्ता में वापसी की रणनीति उनकी प्राथमिकता बनती है।

इसके विपरीत कांग्रेस में कई बार चुनाव जीतने की रणनीति से अधिक समय मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं पर चर्चा में बीत जाता है। परिणामस्वरूप संगठन कमजोर पड़ता है और चुनावी नुकसान उठाना पड़ता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है

अब सवाल यह है कि मुख्यमंत्री पद को लेकर आपसी खींचतान करने वाले कांग्रेस नेताओं को समझाए कौन? कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी ऐसे नेता माने जाते हैं जो भाजपा के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष भी कर रहे हैं। यदि उन्हें ही संगठनात्मक मतभेद सुलझाने में अपनी ऊर्जा लगानी पड़े, तो फिर भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय रणनीति पर पूरा ध्यान कैसे दिया जाएगा?

ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे आखिर अकेले कितनी जिम्मेदारियां निभाएंगे?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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