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Thursday, October 15, 2026
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नेपाल में प्रचंड सरकार: क्या इस बार भी गलेगी ओली की भारत विरोधी दाल !

पिछली ओली सरकार ने भारत के साथ सीमा विवाद छेड़ दिया था और कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख जैसे भारतीय क्षेत्रों को नेपाल के नक्शे में शामिल कर विवाद को हवा दी। हालांकि प्रचंड भारत के साथ सीमा मसले को बातचीत और कूटनीतिक रास्तों से हल करने की हिमायत करते रहे हैं,लेकिन अब देखना होगा कि नई सरकार पर ओली के प्रभाव के चलते प्रचंड रिश्तों को कैसा मोड देेते हैं

-द ओपिनियन-

पुष्पकमल दहल प्रचंड नेपाल के नए प्रधानमंत्री होंगे। वे चीन के करीबी माने जाने वाले के पी शर्मा ओली के समर्थन से प्रधानमंत्री पद पर पहुंचे हैं। इसलिए प्रचंड की सरकार पर ओली का प्रभाव रहना तय है और ओली की छवि भारत विरोधी है। जब औली खुद प्रधानमंत्री थे तब भारत और नेपाल के रिश्तों में आई खटास को भारत भी नहीं भूला होगा। चीन नेपाल में भारत विरोधी जाल बुनता रहा है और औली उसके करीबी हैं ऐसे में नई सरकार को लेेकर भारत का आशंकित होना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रचंड को नेपाल का प्रधानमंत्री बनने पर बधाई दी है और दोनों देशों के रिश्तों के मजबूत होने की उम्मीद जताई है।

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पुप्पकमल दहल प्रचंड। फोटो सोशल मीडिया

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) यानी (सीपीएन-माओवादी सेंटर) के शीर्ष नेता प्रचंड इससे पहले दो बार 2008-2009 और 2016-17 में भी नेपाल के प्रधानमंत्री पद पर रह चुके थे। चुनाव से पहले प्रचंड व देउबा की पार्टियां सरकार में साथ थी लेकिन चुनाव बाद नई सरकार के गठन पर दोनों में सहमति नहीं बन पाई और नए घटनाक्रम में प्रचंड ने वापस अपने तार ओली के साथ जोड़कर सरकार के गठन का रास्ता साफ कर दिया। 275 सीटों वाली नेपाली संसद में ओली की पार्टी को 78 सीटें मिली हैं और प्रचंड की पार्टी को 32 सीटें मिली इसके अलावा पांच अन्य पार्टियों के 55 सदस्यों का भी उनको समर्थन मिल गया है। इस प्रकार प्रचंड ने 165 सदस्यों के समर्थन का दावा राष्टपति विद्यादेवी भंडारी के समक्ष पेश किया। जिस पर राष्टपति ने उनका प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। 275 सदस्यीय सदन में देउबा के पास 110 सदस्यों का समर्थन रह जाने से व सरकार नहीं बना सके। प्रचंड और ओली पार्टियों के बीच हुए समझौते के अनुसार प्रचंड पहले ढाई साल तक नेपाल के प्रधानमंत्री रहेंगे उसके बाद ओली की पार्टी की बारी आ जाएगी। दो साल पहले प्रचंड ओैली की सरकार का हिस्सा थे। लेकिन बाद में ओली के साथ रिश्तों में दरार आगई और प्रचंड सरकार से अलग हो गए। इसके बाद प्रचंड के ही समर्थन से शेरबहादुर देउबा प्रधानमंत्री बने। देउबा भारत से प्रगाढ मैत्री संबंधों के पक्षधर रहे हैं और वे भारत के करीबी भी माने जाते हैं। देउबा के आने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में सुधार भी हुआ। लेकिन चुनाव के बाद वह देउबा से अलग होकर फिर ओली के साथ आ गए हैं। इस प्रकार नेपाल में बन रही नई सरकार पर ओली का प्रभाव रहेगा। अब नई सरकार भारत के साथ रिश्तों को लेकर क्या रुख अपनाती है यह आने वाले दिनों में ही स्पष्ट हो सकेगा।

पिछली ओली सरकार ने भारत के साथ सीमा विवाद छेड़ दिया था और कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख जैसे भारतीय क्षेत्रों को नेपाल के नक्शे में शामिल कर विवाद को हवा दी। हालांकि प्रचंड भारत के साथ सीमा मसले को बातचीत और कूटनीतिक रास्तों से हल करने की हिमायत करते रहे हैं,लेकिन अब देखना होगा कि नई सरकार पर ओली के प्रभाव के चलते प्रचंड रिश्तों को कैसा मोड देेते हैं।

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