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Thursday, October 15, 2026
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‘मैं हूं ना’ का भरोसा: हार के बीच भी कांग्रेस को जिंदा रखने की रणनीति

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photo courtesy social media
लगातार चुनावी हार के बावजूद कांग्रेस का संगठन कैसे सक्रिय बना हुआ है, इसका बड़ा कारण राहुल गांधी का आत्मविश्वास और उनका कार्यकर्ताओं को दिया जाने वाला भरोसा ‘मैं हूं ना’ बनकर उभर रहा है।

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

चुनाव में जीत और हार तो होती रहती है, मगर संगठन को जिंदा कैसे रखा जाए और पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल कैसे मजबूत रखा जाए, यह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से सीखा जा सकता है।

2014 से कांग्रेस लगातार तीन लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी जिंदा है। इसकी वजह राहुल गांधी का आत्मविश्वास है। जब वे कार्यकर्ताओं के सामने यह विश्वास रखते हैं और कहते हैं “घबराना नहीं, डरना नहीं, मैं हूं ना!”, तो यह संदेश कार्यकर्ताओं के मनोबल को मजबूत करता है।

राहुल गांधी का ‘मैं हूं ना’ का अंदाज न केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा रहा है, बल्कि अनेक समस्याओं से जूझ रही जनता को भी संबल देता है। जब राहुल गांधी आम नागरिक की तरह सड़क, खेत और दुकानों पर लोगों से आत्मीयता से मिलते हैं और कहते हैं “चिंता मत करो, आपके साथ मैं हूं ना, समय गुजर जाएगा, अच्छा समय आएगा, घबराओ मत, एक दिन सत्य की जीत होगी” तो यह भरोसा लोगों में आशा जगाता है।

अपने इसी अंदाज के साथ राहुल गांधी इन दिनों पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। वे जनता से रूबरू होकर कह रहे हैं “घबराओ मत, डरो मत, सब ठीक हो जाएगा, सत्य की जीत होगी और अच्छे दिन आएंगे।”

राहुल गांधी चुनावी सभाओं में यह भी बता रहे हैं कि यदि कांग्रेस की सरकार बनी, तो वह जनता के लिए क्या-क्या करेगी।2 अप्रैल को असम में एक विशाल चुनावी सभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा “घबराओ मत, मैं हूं ना। आप असम की भाजपा सरकार को बदलो और एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बनाओ।”

राहुल गांधी के ‘मैं हूं ना’ शब्दों ने असम में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नई ताकत दी है। कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लिए कार्यकर्ता दूर-दराज के राज्यों से भी असम पहुंचकर प्रचार में जुटे हैं। झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी और राजस्थान के मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष एम.डी. चौकीदार जैसे नेता भी वहां जाकर लोगों के बीच कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने में लगे हैं।

राहुल गांधी के जज्बे और विश्वास की अब व्यापक चर्चा होने लगी है। यह भी कहा जा रहा है कि वे विपक्ष के ऐसे नेता हैं, जो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष कर रहे हैं। उनका यह संघर्ष एक दिन भाजपा को केंद्र की सत्ता से बाहर कर सकता है।

देश के पांच राज्यों  के विधानसभा चुनाव के परिणामों पर सबकी नजर है। कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, बल्कि पाने की संभावनाएं अधिक हैं। असम और केरल में कांग्रेस की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। इसका मुख्य कारण वहां के स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं की एकजुटता है।

इससे पहले के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के भीतर एकजुटता का अभाव और गुटबाजी देखी जाती रही है, जिसके चलते कई बार जीती हुई बाजी भी हार में बदल गई। अब बदली हुई रणनीति और संगठनात्मक एकता के साथ कांग्रेस नए आत्मविश्वास के साथ मैदान में है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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