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Thursday, October 15, 2026
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कहो तो कह दूं: पंक्षी को छाया नहीं…

सड़कों के किनारे नीम, पीपल, बड, शीशम, कचनार, करंज, जामुन आदि स्थानीय प्रजाति के जैव विविधता के महत्व के पौधे लगाए ताकि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण के दुष्प्रभाव पर नियंत्रण हो सके और जनता के धन का सदुपयोग हो

-बृजेश विजयवर्गीय-

बृजेश विजयवर्गीय

कोटा. स्मार्ट सिटी कोटा को स्मार्ट बनाने के लिए इन दिनों कोचिंग सिटी की सड़कों पर सजावटी व दिखावटी पाम आदि के पौधे लगाने का काम चल रहा है। इनकी न तो छाया होती है और न ही कोई फल, जिनसे पक्षी पेट भर सकें। प्रशासन को चाहिए कि सड़कों के किनारे नीम, पीपल, बड, शीशम, कचनार, करंज, जामुन आदि स्थानीय प्रजाति के जैव विविधता के महत्व के पौधे लगाए ताकि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण के दुष्प्रभाव पर नियंत्रण हो सके और जनता के धन का सदुपयोग हो। पूर्व में भी राजधानी जयपुर समेत कई जगह पॉम वृक्ष लगाए गए लेकिन इनका हश्र क्या हुआ किसी से छिपा नहीं है। यह समझ नहीं आता कि कोटा की जलवायु में जो पेड पौधे पनप सकते हैं उनको लगाने में क्या समस्या है।
सरकारी महकमों नगर सुधार न्यास, नगरीय निकायों के पास उद्यान विशेषज्ञों के पद हैं जो वर्षों से खाली पड़े हैं। लेकिन विश्व विद्यालयों के प्राध्यापकों, पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की सलाह लें कर शहर का पर्यावरण सुधार सकते हैं। प्रशासन को इसमें क्या परेशानी हो सकती है। धन तो जनता का ही लगना है। यदि किसी विशेष अतिथि को दिखाना ही है तो सार्थक पौधे दिखाएं। आनन फानन में बेमतलब के खर्चीले पौधे लगाने के पीछे जो भी गणित हो लेकिन गुणकारी पौधे लगाने और बचाने से पशु पक्षी एवं मनुष्य सभी फलित होंगे। पेड़ों को लगाने व काटने का निर्णय सक्षम विशेषज्ञ अधिकारी करता है। जबकि इन दिनों कोटा में पेड पौधे लगाने का काम ऐसे लोगों को सौंप रखा है जैसे इतिहास का शिक्षक विज्ञान और वाणिज्य का अध्यापक संस्कृत पढाने लगे।

(जल बिरादरी व बाघ चीता मित्र, चम्बल संसद के संयोजक,यह लेखक के निजी विचार हैं)

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