धूप सेंकने से बड़ा कोई सुख नहीं

-विवेक कुमार मिश्र-

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डॉ. विवेक कुमार मिश्र

इस ठंडी रात की सुबह तो होगी इस उम्मीद में अपने जीव को पंख में समेटे एक पंक्ति में बगुले ऐसे बैठे हैं कि जैसे धूप का सेवन कर रहे हों। इस समय इससे बड़ा कोई सुख नहीं हो सकता। सुबह की सुनहरी धूप का आनंद बच्चे-बड़े-बुजुर्ग सभी लेते हैं तो वहीं जब ठंड हद से ज्यादा बढ़ जाती तो जीव अपने को जतन करते हुए धूप सेंकते हैं या पुआल, मांद आदि में छिप जाते हैं। बगुले इन दिनों खेत किनारे, नहर, नाले के आसपास भोजन और धूप की आस में एक आसन में बैठे रहते हैं जैसे कोई बड़ा अभ्यास या साधना कर रहे हों। जीव जीव की बात है। यहां बगुले हैं जो एक किनारे से धूप का आनंद ले रहे हैं और यहीं घास-फूस व जलस्रोत में अपना भोजन भी तलाश लेंगे पर अभी तो धूप सेंकते हैं जैसे सभी ने मिलकर प्लान बनाया हो। इन दिनों धूप सेंकने से बढ़कर कोई और कारज नहीं है ।
– विवेक कुमार मिश्र

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