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Wednesday, October 28, 2026
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राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के सामने 1980 और 2004 का इतिहास दोहराने की चुनौती

photo courtesy social media

-1 नवंबर को दिल्ली में जुटेंगे देशभर के कांग्रेसी

-भाजपा की नीतियों के खिलाफ रामलीला मैदान में संघर्ष की तैयारी

-देवेन्द्र यादव-

devendra yadav
देवेन्द्र यादव

1980 और 2004 के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर देशभर के कांग्रेस कार्यकर्ता और छोटे-बड़े नेता अपने राष्ट्रीय नेता के साथ सत्ताधारी पार्टी की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ 1 नवंबर को दिल्ली में एकजुट होकर संघर्ष करते नजर आएंगे।

1977 में जब इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हुई थीं, तब कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता उनके नेतृत्व में सत्ताधारी जनता पार्टी के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने केंद्र की सत्ता में वापसी की।

इसी तरह, 1996 में केंद्र की सत्ता से बाहर रहने के बाद कांग्रेस ने सोनिया गांधी के नेतृत्व में फिर से अपनी राजनीतिक ताकत जुटाई। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा और उसके सहयोगियों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ रहा था। बाद के वर्षों में भाजपा ने ‘शाइनिंग इंडिया’ के नारे के साथ देशभर में अपनी उपलब्धियों का प्रचार किया। इसके बावजूद सोनिया गांधी ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुट कर पार्टी को मजबूती देने का प्रयास जारी रखा। इसका परिणाम 2004 के लोकसभा चुनाव में सामने आया, जब कांग्रेस ने जीत दर्ज कर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनाई। डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बनी यह सरकार एक दशक तक सत्ता में रही।

राहुल गांधी के सामने इतिहास दोहराने की चुनौती

2014 में कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई और तब से अब तक पार्टी केंद्र में सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाई है। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा लगातार तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाने में सफल रही।

अब 1980 में इंदिरा गांधी और 2004 में सोनिया गांधी के दौर की तरह राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के कार्यकर्ता और छोटे-बड़े नेता एकजुट होते दिखाई दे रहे हैं। 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाले कार्यक्रम के लिए देशभर से कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के पहुंचने की तैयारियां की जा रही हैं। पार्टी के सामने चुनौती सत्ताधारी भाजपा की नीतियों के खिलाफ देशव्यापी राजनीतिक माहौल तैयार करने की है।

2014 के बाद यह एक ऐसा अवसर माना जा रहा है, जब कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता राहुल गांधी के साथ मिलकर दिल्ली में एकजुटता का प्रदर्शन करेंगे और केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करेंगे।

राहुल गांधी ने लगातार जारी रखा संघर्ष

2014 में केंद्र की सत्ता से बाहर होने के बाद राहुल गांधी उन प्रमुख कांग्रेस नेताओं में रहे, जिन्होंने भाजपा सरकार के खिलाफ लगातार आवाज उठाई। उनकी राजनीतिक क्षमता का असर 2018 के विधानसभा चुनावों में भी दिखाई दिया, जब कांग्रेस ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत दर्ज की।

उस समय राहुल गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में पार्टी ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे समय से सत्ता में रही भाजपा को हराकर सरकार बनाई। हालांकि, मध्य प्रदेश में नेतृत्व और सत्ता को लेकर कांग्रेस के भीतर खींचतान बढ़ती गई। अंततः करीब 15 महीने बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने और विधायकों के समर्थन बदलने के बाद कमलनाथ सरकार गिर गई और भाजपा ने फिर सत्ता हासिल कर ली।

नेताओं के बीच सत्ता और नेतृत्व को लेकर मतभेदों का असर कांग्रेस के संगठन पर भी पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

इसके बावजूद राहुल गांधी ने भाजपा के खिलाफ अपना राजनीतिक संघर्ष जारी रखा। उन्होंने 2022 में भारत जोड़ो यात्रा निकाली और बाद में भारत जोड़ो न्याय यात्रा के माध्यम से विभिन्न मुद्दों को उठाया। इन अभियानों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा पैदा करने और पार्टी को जनता के बीच अपने मुद्दे रखने का अवसर देने में भूमिका निभाई।

2024 के चुनाव में कांग्रेस ने दिखाई ताकत

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतीं। भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई और अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी। इस चुनाव परिणाम ने राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के राजनीतिक पुनरुत्थान की संभावनाओं को फिर चर्चा में ला दिया।

इसके बाद राहुल गांधी ने मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सवालों को लेकर भी अभियान चलाए। ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ जैसे नारों के माध्यम से कांग्रेस ने भाजपा पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। इन अभियानों ने एक बार फिर राहुल गांधी को केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की आवाज के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

क्या 1 नवंबर से बनेगी सत्ता वापसी की राह?

राहुल गांधी की आवाज में कितना दम है और उनके नेतृत्व में कांग्रेस किस हद तक एकजुट होकर भाजपा को चुनौती दे सकती है, इसका आकलन 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाले कार्यक्रम से भी किया जाएगा। देशभर से आने वाले कार्यकर्ताओं की भागीदारी, नेताओं की एकजुटता और कार्यक्रम के बाद पार्टी की राजनीतिक सक्रियता इसके महत्वपूर्ण संकेत होंगे।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस इंदिरा गांधी के 1980 और सोनिया गांधी के 2004 के दौर जैसा राजनीतिक माहौल तैयार कर पाएगी? क्या पार्टी अपनी संगठनात्मक कमजोरियों और आंतरिक मतभेदों को दूर कर केंद्र की सत्ता में वापसी का रास्ता बना सकेगी?

इन सवालों के जवाब केवल एक दिन के शक्ति प्रदर्शन से नहीं मिलेंगे। इसके लिए कांग्रेस को देशभर में संगठन मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और जनता के मुद्दों पर लगातार संघर्ष करने की जरूरत होगी। फिर भी, 1 नवंबर का कार्यक्रम राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की आगे की राजनीतिक दिशा और उसकी एकजुटता का महत्वपूर्ण संकेत जरूर दे सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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