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Wednesday, November 4, 2026
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2029 की सियासी जंग : अमित शाह का भाजपा मिशन, सोनिया गांधी का कांग्रेस प्लान

बड़ा सवाल यही है कि क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस नए कलेवर, नए राजनीतिक समीकरण और नई रणनीति के साथ मैदान में उतरेंगी? क्या अमित शाह की सियासी बिसात पर सोनिया गांधी का राजनीतिक अनुभव भारी पड़ेगा? इसका जवाब आने वाला समय देगा।

photo courtesy social media

सत्ता बचाने और वापसी की तैयारी में जुटे दोनों दिग्गज नेता, क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में नए कलेवर में नजर आएंगी भाजपा और कांग्रेस?

-देवेन्द्र यादव-

devendra yadav
देवेन्द्र यादव

क्या 2029 में केंद्र की सत्ता बरकरार रखने के लिए भाजपा और सत्ता में वापसी की कोशिश में जुटी कांग्रेस ने अपनी-अपनी नई राजनीतिक रणनीति पर काम शुरू कर दिया है? क्या केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं यूपीए चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी अपनी-अपनी पार्टियों को नए सिरे से खड़ा करने में जुट गए हैं? देश में विभिन्न समस्याओं को लेकर सरकार के खिलाफ चल रहे जन आंदोलनों के बीच भाजपा और कांग्रेस के ये दोनों दिग्गज नेता इन दिनों राजनीतिक रूप से सक्रिय नजर आ रहे हैं।

दोनों ही नेता अपने-अपने तरीके से लोकतंत्र बचाने की बात कर रहे हैं, लेकिन उनके इस अभियान के पीछे 2029 की सत्ता का सियासी गणित भी दिखाई देता है। जहां अमित शाह भाजपा की सत्ता बरकरार रखने के लिए राजनीतिक बिसात बिछा रहे हैं, वहीं सोनिया गांधी कांग्रेस की केंद्र की सत्ता में वापसी का रास्ता तैयार करने में जुटी हैं।

सवाल यह है कि अमित शाह भाजपा की सत्ता कैसे बरकरार रखेंगे और सोनिया गांधी कांग्रेस को केंद्र की सत्ता में वापस कैसे लाएंगी? क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में देश को भाजपा और कांग्रेस का नया राजनीतिक स्वरूप देखने को मिलेगा? क्या दोनों दलों ने इस दिशा में अपने कदम बढ़ा दिए हैं?

कांग्रेस की बात करें तो सोनिया गांधी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता इस ओर इशारा कर रही है कि 2029 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लिए एक बार फिर 2004 के सोनिया गांधी युग की झलक देखने को मिल सकती है। सोनिया गांधी के नेतृत्व में उस दौर के कई नेता और रणनीतिकार एक बार फिर कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते दिखाई दे सकते हैं।

लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि सोनिया गांधी युग के वे तमाम बड़े नेता कहां हैं, जिन्होंने कभी कांग्रेस की राजनीति को मजबूती दी थी? इनमें से कई नेता कांग्रेस छोड़कर अपने-अपने राज्यों में क्षेत्रीय दल बना चुके हैं, जबकि कुछ भाजपा में शामिल हो गए हैं। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस छोड़कर क्षेत्रीय दल बनाने वाले कई नेताओं के राजनीतिक समीकरण भी अब बदल चुके हैं। कुछ राज्यों में उनकी सरकारें सत्ता से बाहर हो चुकी हैं और उनके दलों तथा नेताओं के राजनीतिक अस्तित्व पर भी संकट गहराने लगा है।

ऐसे में क्या ये तमाम नेता एक बार फिर मोदी सरकार को सत्ता से हटाने के लिए एकजुट होकर कांग्रेस के साथ खड़े होंगे? क्या वे अपने पुराने राजनीतिक घर में लौटेंगे? यह बड़ा सवाल है। सोनिया गांधी की मौजूदा सक्रियता को देखें तो लगता है कि उनके बड़े राजनीतिक प्लान का एक हिस्सा इन पुराने नेताओं और रणनीतिकारों को फिर से एक मंच पर लाना हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह रणनीति 2029 में भाजपा को चुनौती देने और कांग्रेस तथा यूपीए की सत्ता में वापसी का आधार बन सकती है।

इसकी शुरुआती झलक 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में दिखाई दी, जहां सोनिया गांधी की मौजूदगी में उनके राजनीतिक दौर के कई पुराने नेता मंच पर एक साथ नजर आए। इसके अगले ही दिन, 2 नवंबर को सोनिया गांधी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से मिलने उनके आवास पहुंचीं। इन दोनों राजनीतिक घटनाक्रमों को जोड़कर देखें तो कांग्रेस में एक बार फिर 2004 के सोनिया गांधी युग की आहट महसूस होने लगी है।

सोनिया गांधी शायद यह समझ रही हैं कि राहुल गांधी की लोकप्रियता जनता के बीच लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसका पूरा चुनावी लाभ कांग्रेस को नहीं मिल पा रहा है। राहुल गांधी की लोकप्रियता को पार्टी की चुनावी सफलता में बदलने के लिए जरूरी है कि सोनिया गांधी युग के पुराने नेता और रणनीतिकार भी पूरी ईमानदारी से उनके साथ खड़े हों। वे राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करें और एकजुट होकर 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटें।

1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान के मंच पर इसकी शुरुआती झलक जरूर दिखाई दी, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह एकजुटता 2029 तक कायम रह पाएगी? क्योंकि कांग्रेस की इस संभावित रणनीति के बीच भाजपा की ओर से भी राजनीतिक सक्रियता तेज हो गई है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को राजनीति का चाणक्य कहा जाता है। वे किसी भी राजनीतिक चुनौती को हल्के में नहीं लेते। उन्होंने 3 नवंबर को कांग्रेस के मजबूत राजनीतिक प्रभाव वाले दक्षिण भारत में लोकतंत्र बचाओ रैली के जरिए अपनी सक्रियता का संदेश दिया। इस रैली को भाजपा की दक्षिण भारत में राजनीतिक विस्तार की रणनीति से जोड़कर भी देखा जा सकता है। संभव है कि भाजपा का अगला बड़ा लक्ष्य दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना और वहां सरकार बनाने की संभावनाओं को विस्तार देना हो।

अमित शाह की दक्षिण भारत में सक्रियता का एक दूसरा राजनीतिक पहलू भी है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू केंद्र की मोदी सरकार के प्रमुख सहयोगियों में शामिल हैं। ऐसे में आंध्र प्रदेश में भाजपा की राजनीतिक सक्रियता और अमित शाह का दौरा कई तरह के सियासी संकेत दे रहा है। क्या भाजपा दक्षिण भारत में अपनी ताकत बढ़ाने के साथ-साथ अपने सहयोगियों के बीच भी राजनीतिक संतुलन साधने की रणनीति पर काम कर रही है? यह भी देखने वाली बात होगी।

कुल मिलाकर 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने राजनीतिक समीकरण नए सिरे से गढ़ती दिखाई दे रही हैं। एक तरफ अमित शाह भाजपा की सत्ता बरकरार रखने के लिए रणनीतिक मोर्चेबंदी में जुटे हैं तो दूसरी तरफ सोनिया गांधी कांग्रेस की वापसी के लिए पुराने राजनीतिक साथियों और रणनीतिकारों को फिर से जोड़ने की कोशिश करती नजर आ रही हैं।

बड़ा सवाल यही है कि क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस नए कलेवर, नए राजनीतिक समीकरण और नई रणनीति के साथ मैदान में उतरेंगी? क्या अमित शाह की सियासी बिसात पर सोनिया गांधी का राजनीतिक अनुभव भारी पड़ेगा? इसका जवाब आने वाला समय देगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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