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Sunday, November 1, 2026
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मन में है विश्वास… हम होंगे कामयाब एक दिन

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने बदला राजनीतिक संघर्ष का रुख, विपक्ष की एकजुटता और जनसमर्थन ने बढ़ाया आत्मविश्वास

photo courtesy social media

-देवेंद्र यादव-

devendra yadav
देवेन्द्र यादव

‘मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन…’ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इन दिनों इस गीत की पंक्तियों को आत्मसात कर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
राहुल गांधी की राजनीतिक कामयाबी की कहानी समझने के लिए वर्ष 2014 से शुरुआत करनी होगी। इसी साल कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई थी। इसके बाद कांग्रेस के कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने लगे। पार्टी में बचे कई वरिष्ठ नेता भी राजनीतिक रूप से खामोश हो गए। एक तरफ बड़े नेता कांग्रेस का साथ छोड़ रहे थे, तो दूसरी तरफ पार्टी में मौजूद नेताओं की आवाज भी भाजपा की नीतियों के खिलाफ उतनी मुखर नहीं थी। वहीं, विपक्ष के कई नेता कांग्रेस को कमजोर या लगभग खत्म मानने लगे थे।
कांग्रेस के इस कठिन दौर में राहुल गांधी अकेले ऐसे नेता के रूप में सामने आए, जो लगातार भाजपा की नीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। उनकी स्थिति कुछ ऐसी थी, जैसे गीत की पंक्तियां कहती हैं- ‘सबके होते लगता है, जैसे कोई नहीं है मेरा।’ लेकिन राहुल गांधी के पास धैर्य और विश्वास था। उन्होंने इन्हीं दोनों को अपनी राजनीतिक ताकत और ढाल बनाया।
भारत जोड़ो यात्रा बनी राजनीतिक बदलाव का टर्निंग पॉइंट
वर्ष 2022 में राहुल गांधी ने करीब 6,000 किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा शुरू की। इसके बाद भारत जोड़ो न्याय यात्रा के माध्यम से भी उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों से संवाद किया। इन यात्राओं के जरिए उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम जनता को जोड़ने का प्रयास किया।
इसी राजनीतिक दौर में कांग्रेस के 82 वर्षीय वरिष्ठ दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और खड़गे को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपना कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ साबित हुआ।
इन प्रयासों का असर 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखाई दिया। एक दशक बाद कांग्रेस ने 99 लोकसभा सीटें जीतीं। राहुल गांधी पहली बार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने। इस चुनावी सफलता ने राहुल गांधी के आत्मविश्वास को बढ़ाया और उनकी राजनीतिक यात्रा को नई दिशा दी।
संसद से सड़क तक उठाए जनहित के मुद्दे
2024 के बाद राहुल गांधी संसद से लेकर सड़क तक लगातार आम लोगों की समस्याओं को उठाते रहे हैं। सत्ता पक्ष के खिलाफ उनके उठाए कई मुद्दों को जनता के बीच समर्थन मिलता दिखाई दिया। इससे उनके प्रति लोगों का विश्वास भी बढ़ा है।
देश के छात्रों और युवाओं की समस्याओं को लेकर राहुल गांधी ने विभिन्न राज्यों में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रमों के जरिए उनसे सीधा संवाद किया। उन्होंने छात्रों की समस्याएं सुनीं और उनके मुद्दों को राजनीतिक मंचों पर उठाया। इस पहल से युवाओं के बीच उनकी सक्रियता और पहचान बढ़ी।
राहुल गांधी की एक बड़ी कामयाबी कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को फिर से एकजुट करना भी है। उनके नेतृत्व में कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता भाजपा की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर संघर्ष करते दिखाई दिए। कांग्रेस के इस संघर्ष और राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता ने विपक्ष के दूसरे दलों के नेताओं को भी उनके नेतृत्व में एकजुट होने के लिए प्रेरित किया।
यह राहुल गांधी और कांग्रेस की एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है। हालांकि, यह कामयाबी अपने अंतिम मुकाम तक कब पहुंचेगी, यह देखना अभी बाकी है। लेकिन राहुल गांधी के राजनीतिक सफर को देखकर लगता है कि उन्होंने ‘मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन’ के संकल्प को अब भी नहीं छोड़ा है। वे लगातार इसी विश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
साधु-संतों की भागीदारी ने मार्च को बनाया खास
देश में तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों को देखते हुए लगता है कि राहुल गांधी के लिए राजनीतिक मंजिल अब बहुत दूर नहीं है। एक नवंबर को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर निकाले जाने वाले मार्च को लेकर भी राजनीतिक हलचल तेज है।
इस मार्च की खास बात यह है कि इसमें देश के विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हो रहे हैं। सत्ताधारी भाजपा के लिए यह मार्च इसलिए भी चिंता का विषय बन सकता है, क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में साधु-संतों के शामिल होने की बात सामने आई है।
इसकी झलक बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव के दिल्ली स्थित आवास पर देखने को मिली। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से बड़ी संख्या में साधु-संत मार्च में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंचे हैं। पप्पू यादव ने इनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था अपने आवास पर की है।
यह अपने आप में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है कि लोकतंत्र को बचाने की राहुल गांधी की आवाज को साधु-संतों ने भी गंभीरता से लिया है और वे मार्च में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंचे हैं। इसमें निर्दलीय सांसद पप्पू यादव की भूमिका भी अहम रही है।
पप्पू यादव के अनुसार, बिहार से करीब 10 हजार लोग मार्च में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंचे हैं। इनमें बड़ी संख्या साधु-संतों की है। उनके रहने और खाने-पीने की व्यवस्था भी पप्पू यादव की ओर से की गई है।
अब देखना होगा कि एक नवंबर का यह मार्च राहुल गांधी के राजनीतिक संघर्ष को किस दिशा में ले जाता है और क्या यह उनकी कामयाबी की यात्रा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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