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Tuesday, November 3, 2026
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राहुल गांधी ने जीत ली पहली बड़ी राजनीतिक जंग, विपक्ष ने स्वीकारा नेतृत्व

1 नवंबर की दिल्ली रैली ने बदली विपक्ष की सियासी तस्वीर; भाजपा की राजनीतिक रणनीति ने ही तैयार की कांग्रेस की छतरी के नीचे विपक्षी एकजुटता की जमीन सोनिया गांधी की भूमिका पर भी उठे सवाल

photo courtesy social media
सोनिया गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बार विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने और गठबंधन की राजनीति को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या राहुल गांधी की मौजूदा राजनीतिक रणनीति के पीछे भी सोनिया गांधी का अनुभव और मार्गदर्शन काम कर रहा है।

-देवेंद्र यादव-

devendra yadav

कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन की ओर से 1 नवंबर को दिल्ली में आयोजित विशाल रैली के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने इसके सियासी मायनों की पड़ताल शुरू कर दी है। रैली कितनी सफल रही, क्या इसने विपक्ष की पिछली राजनीतिक रैलियों के रिकॉर्ड तोड़े और क्या रामलीला मैदान की यह सभा विपक्षी एकजुटता के इतिहास में नया अध्याय जोड़ने में कामयाब रही? इन तमाम सवालों पर चर्चा हो रही है। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक करियर की पहली बड़ी जंग जीत ली है? इस सवाल पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।

पहली नजर में इसका जवाब हां में दिखाई देता है। राहुल गांधी ने 1 नवंबर को दिल्ली में विशाल रैली के जरिए राजनीतिक रूप से एक बड़ी लड़ाई जीती है। दरअसल, 2014 के बाद से लगातार उनकी राजनीतिक क्षमता और गंभीरता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। कभी उन्हें पार्ट टाइम पॉलिटिशियन कहा गया तो कभी उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता और नेतृत्व क्षमता पर संदेह जताया गया। राहुल गांधी को लेकर ऐसी चर्चाएं केवल सत्ता पक्ष भारतीय जनता पार्टी तक सीमित नहीं थीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर और विपक्षी दलों के नेताओं के बीच भी समय-समय पर सुनाई देती रही हैं।

लेकिन 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे विपक्षी नेताओं ने इन तमाम चर्चाओं को एक नई दिशा दे दी। कल तक जो विपक्षी नेता राहुल गांधी की राजनीतिक गंभीरता और नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते थे, वे उसी दिन रामलीला मैदान के विशाल मंच से उनके नेतृत्व की सराहना करते और एकजुटता का संदेश देते दिखाई दिए। पहली बार ऐसा राजनीतिक दृश्य सामने आया, जब विपक्ष के कई दलों और उनके नेताओं ने अपने राजनीतिक भविष्य और अस्तित्व की लड़ाई में कांग्रेस के साथ खड़े होने का स्पष्ट संकेत दिया। यह भी महसूस हुआ कि विपक्षी दल अब कांग्रेस की छतरी के नीचे एकजुट होकर राहुल गांधी के नेतृत्व में आगे बढ़ने को तैयार हैं।

सवाल यह है कि आखिर विपक्षी दल कांग्रेस के करीब क्यों आए? उन्होंने राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने की जरूरत क्यों महसूस की? इसका राजनीतिक विश्लेषण करें तो इसकी आधारशिला कहीं न कहीं भाजपा और उसकी राजनीतिक रणनीति ने ही तैयार की है। राहुल गांधी ने भाजपा की इसी राजनीतिक बुनियाद पर अपनी एकजुटता की इमारत खड़ी की है।

पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और दिल्ली की राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो विपक्षी दलों के सामने चुनौतियां लगातार बढ़ी हैं। पश्चिम बंगाल और दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी के सांसदों को भाजपा की ओर से अपने पाले में लाने की कोशिशों और राजनीतिक घटनाक्रमों ने इन दलों की चिंताएं बढ़ाई हैं। यदि भाजपा की राजनीतिक रणनीति और विपक्षी दलों को कमजोर करने के प्रयास इस तरह सामने नहीं आते तो शायद ममता बनर्जी और अन्य विपक्षी नेता कांग्रेस के साथ इस तरह खड़े दिखाई नहीं देते और न ही राहुल गांधी के नेतृत्व को इतनी सहजता से स्वीकार करते।

यानी राजनीतिक परिस्थितियों और मजबूरियों ने विपक्ष के अनेक दलों को कांग्रेस की छतरी के नीचे आने के लिए प्रेरित किया है। आज उन्हें महसूस होने लगा है कि भाजपा के मुकाबले राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए कांग्रेस ही ऐसा राष्ट्रीय दल है, जिसके पास देशव्यापी संगठन, कार्यकर्ता और राजनीतिक आधार मौजूद है। राहुल गांधी भी अब विपक्ष के ऐसे नेता के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं, जिनके नेतृत्व में भाजपा को चुनौती देने की संभावना विपक्षी दलों को नजर आने लगी है।

जनता के समर्थन से बढ़ा राहुल का आत्मविश्वास

1 नवंबर की रैली ने राहुल गांधी के राजनीतिक आत्मविश्वास को भी नई ताकत दी है। रामलीला मैदान से उन्होंने यह संकेत दे दिया कि अब वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। उनके भाषण और राजनीतिक तेवरों में यह भरोसा दिखाई दिया कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ-साथ देश की जनता का समर्थन भी उनके साथ खड़ा हो रहा है। शायद यही वजह है कि रैली के अगले ही दिन, 2 नवंबर को राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली बहस की चुनौती दे दी।

अब देखना यह होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस चुनौती को स्वीकार करते हैं या नहीं। लेकिन इस घटनाक्रम का बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि राहुल गांधी अब अकेले विपक्ष की लड़ाई लड़ते दिखाई नहीं दे रहे हैं। उनके साथ कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता तो हैं ही, विपक्ष के दूसरे दलों के नेता भी एक मंच पर खड़े नजर आ रहे हैं। यह बदलाव राहुल गांधी की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है।

क्या सोनिया गांधी हैं राहुल की राजनीतिक कामयाबी की सूत्रधार?

हालांकि, विपक्षी नेताओं का राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी खड़ा करता है। आखिर जो नेता अब तक राहुल गांधी की राजनीतिक क्षमता पर संदेह करते रहे, वे अचानक उनके साथ मजबूती से क्यों खड़े दिखाई देने लगे? क्या इसके पीछे कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी की राजनीतिक रणनीति और भूमिका है? क्या सोनिया गांधी अब राहुल गांधी की राजनीतिक गुरु की भूमिका निभा रही हैं? क्या विपक्ष को एकजुट करने और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ने का जो अनुभव सोनिया गांधी के पास है, वही राहुल गांधी की मौजूदा राजनीतिक कामयाबी का आधार बन रहा है?

सोनिया गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बार विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने और गठबंधन की राजनीति को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या राहुल गांधी की मौजूदा राजनीतिक रणनीति के पीछे भी सोनिया गांधी का अनुभव और मार्गदर्शन काम कर रहा है।

बहरहाल, 1 नवंबर की दिल्ली रैली ने राहुल गांधी की राजनीति को एक नया मोड़ जरूर दिया है। अब तक जिन राहुल गांधी को विपक्षी दलों के कुछ नेता गंभीर चुनौती के रूप में नहीं देखते थे, उन्हीं के नेतृत्व में विपक्षी एकजुटता की नई तस्वीर उभरती दिखाई दे रही है। यह उनके राजनीतिक सफर की एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इस उपलब्धि को स्थायी राजनीतिक कामयाबी में बदलना राहुल गांधी और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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