
मोदी को खुली बहस का न्योता, मंत्रियों के संसद में चर्चा के जवाब के बीच राहुल का असली सवाल,क्या प्रधानमंत्री सदन में मौजूद रहकर विपक्ष के सवालों का जवाब देंगे?
-देवेन्द्र यादव-

इंडिया गठबंधन की दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई विशाल रैली के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली बहस की चुनौती दी है। राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री को बहस के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। इस चुनौती का जवाब देते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर सदन के भीतर विपक्ष के सवालों पर चर्चा करने की बात कही है। केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव सहित अन्य मंत्री भी राहुल गांधी को संसद में आकर बहस करने और अपने सवालों के जवाब लेने की चुनौती दे रहे हैं।
वहीं, राहुल गांधी का कहना है कि संसद में उन्हें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। उनका आरोप है कि कई बार उनका माइक बंद कर दिया जाता है और उनके सवालों को सदन की कार्यवाही से हटा दिया जाता है। राहुल गांधी यह आरोप भी लगाते रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके उठाए सवालों का सदन में सीधे जवाब देने से बचते हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी भी चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ बहस सड़क या किसी सार्वजनिक मंच पर नहीं, बल्कि संसद के भीतर हो? क्या उनकी मंशा है कि प्रधानमंत्री सदन में मौजूद रहें और विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले सवालों का जवाब स्वयं दें?
राहुल गांधी ने खुली बहस के लिए जिन मुद्दों को उठाया है, वे ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें वे अलग-अलग समय पर संसद में भी उठा चुके हैं। इनमें सरकार की नीतियों, देश की मौजूदा परिस्थितियों और जनता से जुड़े सवाल शामिल हैं। राहुल गांधी का कहना है कि उन्हें इन मुद्दों पर संसद में अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं मिलता और प्रधानमंत्री भी उनके सवालों के जवाब देने के लिए सदन में मौजूद नहीं रहते।
ऐसे में यह भी समझने की जरूरत है कि राहुल गांधी की बहस की चुनौती का राजनीतिक संदेश क्या है? क्या वे चाहते हैं कि बहस का स्थान और स्वरूप ऐसा हो, जहां प्रधानमंत्री की मौजूदगी सुनिश्चित हो और सवालों के जवाब सरकार के किसी अन्य मंत्री के बजाय स्वयं प्रधानमंत्री दें?
भाजपा के नेता और केंद्रीय मंत्री राहुल गांधी की चुनौती का जवाब संसद में चर्चा के लिए आमंत्रित करके दे रहे हैं। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या संसद में बहस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं मौजूद रहेंगे और विपक्ष के सवालों का जवाब देंगे? यदि ऐसा होता है तो यह केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस नहीं होगी, बल्कि संसदीय लोकतंत्र में जवाबदेही और संवाद का भी महत्वपूर्ण अवसर होगा।
इस पूरे घटनाक्रम को 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई इंडिया गठबंधन की रैली के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। इस रैली में विपक्षी दल एकजुट नजर आए थे। अब सवाल यह है कि क्या विपक्षी दलों की यह एकजुटता संसद के भीतर भी उसी रूप में दिखाई देगी? इससे पहले कई मौकों पर संसद में विपक्षी दलों के बीच वैसी समन्वित एकता नहीं दिखी थी, जैसी हाल के दिनों में दिखाई दे रही है।
राहुल गांधी के बयानों पर गौर करें तो वे लगातार कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे जहां चाहें, वहां खुली बहस कर सकते हैं। ऐसे में उनकी चुनौती में संसद भी एक संभावित मंच हो सकता है। हालांकि, राहुल गांधी की मंशा को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय इस सवाल पर ध्यान देना जरूरी है कि क्या सत्ता पक्ष इस चुनौती को संसद में सार्थक बहस और प्रधानमंत्री की प्रत्यक्ष भागीदारी के अवसर के रूप में स्वीकार करेगा?
आखिरकार, लोकतंत्र में बहस का महत्व केवल चुनौती देने या स्वीकार करने तक सीमित नहीं है। असली महत्व इस बात का है कि जनता से जुड़े सवालों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने बैठें, एक-दूसरे की बात सुनें और सरकार उन सवालों का जवाब दे, जिनका जवाब जनता जानना चाहती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)


















