
-सोनिया गांधी युग के अनुभवी नेताओं और राहुल गांधी के युवा जोश का मेल कांग्रेस को नई ताकत दे पाएगा?
-क्या अब पार्टी के भीतर भरोसे और अहमियत का संकट खत्म होगा?
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस के भीतर भाजपा का कोई स्लीपर सेल नहीं है। सभी अपने हैं, जो भाजपा की नीतियों के खिलाफ सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं। क्या लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दीपावली मिलन समारोह के जरिए कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यही संदेश देने की कोशिश की है?
शुक्रवार, 6 नवंबर को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के दिल्ली स्थित निवास पर आयोजित दीपावली मिलन समारोह में सोनिया गांधी और राहुल गांधी युग के नेताओं का संगम देखने को मिला। यह संगम कांग्रेस की भविष्य की राजनीति के लिए क्या संकेत देता है? क्या सोनिया गांधी युग के बुजुर्ग और राजनीतिक रूप से जख्मी शेर एक बार फिर दहाड़ेंगे? क्या राजनीतिक अनुभव, ताकत और युवा जोश का मिश्रण कांग्रेस को 2029 के लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत दिलाकर केंद्र की सत्ता में वापसी का रास्ता दिखा पाएगा?
कांग्रेस को शायद इसी दिन का इंतजार था, जब सोनिया गांधी और राहुल गांधी युग के नेता एक ही मंच पर, एक ही माहौल में साथ नजर आएं। 2014 के बाद से कांग्रेस के भीतर कई बार ऐसा महसूस हुआ, मानो पार्टी के नेता टीम सोनिया गांधी, टीम राहुल गांधी और टीम प्रियंका गांधी में बंटे हुए हैं। राजनीतिक गलियारों में इस तरह की चर्चाएं भी होती रहीं कि पार्टी के भीतर यह खींचतान चुनावी नुकसान की एक बड़ी वजह बन रही है। लेकिन 6 नवंबर को राहुल गांधी के दिल्ली स्थित आवास पर दीपावली मिलन समारोह के बहाने तीनों धाराओं का एक साथ नजर आना पार्टी के लिए एक सकारात्मक राजनीतिक संकेत माना जा सकता है।
मैंने अपने पिछले ब्लॉग में कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की एक बार फिर बढ़ती राजनीतिक सक्रियता का जिक्र किया था। 6 नवंबर का दीपावली मिलन समारोह भी उनकी इसी सक्रियता का हिस्सा दिखाई दिया। समारोह में सोनिया गांधी के राजनीतिक दौर के नेताओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी खास रही। उनके चेहरों पर उत्साह और प्रसन्नता भी नजर आई। शायद उन्हें महसूस हो रहा था कि कांग्रेस की राजनीति में अब उनकी भूमिका और अहमियत फिर से बढ़ सकती है। पार्टी के भीतर उन्हें संदेह की नजर से देखने के बजाय उनके राजनीतिक अनुभव का सम्मान किया जाएगा।
दरअसल, कांग्रेस जब एक के बाद एक विधानसभा और लोकसभा चुनाव हार रही थी, तब पार्टी के भीतर से ही ऐसी आवाजें उठती थीं कि कांग्रेस में कुछ स्लीपर सेल हैं, जो भाजपा के साथ मिलकर पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस तरह की चर्चाओं और आरोपों ने कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को भीतर तक आहत किया। राजनीतिक अनुभव और संगठन के प्रति वर्षों की निष्ठा रखने वाले कई नेता धीरे-धीरे खामोश होते चले गए। उनके मन में यह सवाल भी रहा होगा कि जिस पार्टी को उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का बड़ा हिस्सा दिया, उसी में अब उनकी निष्ठा पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
लेकिन 6 नवंबर के दीपावली मिलन समारोह में सोनिया गांधी के दौर के कई बुजुर्ग और अनुभवी नेता उत्साहित नजर आए। सवाल यह है कि क्या अब राहुल गांधी के युवा और ऊर्जावान नेताओं के साथ सोनिया गांधी के अनुभवी नेता मिलकर कांग्रेस की राजनीति का नया अध्याय लिखेंगे? क्या राहुल गांधी के बब्बर शेर और सोनिया गांधी के बुजुर्ग शेर एक साथ मिलकर भाजपा की राजनीतिक चुनौती का मुकाबला कर पाएंगे? यदि ऐसा होता है तो कांग्रेस के लिए यह केवल नेताओं का मेल नहीं, बल्कि संगठन के भीतर भरोसे और अनुभव की वापसी भी हो सकती है।
2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने 2024 में अपनी स्थिति में उल्लेखनीय सुधार किया। पार्टी केंद्र की सत्ता में वापसी से भले ही दूर रही, लेकिन भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने से विपक्ष के लिए राजनीतिक संभावनाएं जरूर बनीं। 2024 के चुनाव परिणामों ने यह दिखाया कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन मिलकर भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकते हैं।
2004 के लोकसभा चुनाव की याद करें तो उस समय कांग्रेस ने अपने अनुभवी नेताओं और मजबूत रणनीतिकारों के दम पर सरकार बनाने का रास्ता तैयार किया था। उस दौर में गठबंधन की राजनीति को समझने और सहयोगी दलों को साथ रखने की क्षमता कांग्रेस की बड़ी ताकत थी। 2024 में भी कांग्रेस के सामने ऐसा ही एक राजनीतिक अवसर आया था। भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था और नीतीश कुमार तथा चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं की भूमिका सरकार गठन के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गई थी।
कांग्रेस के पास अनुभवी नेताओं की कमी नहीं थी, लेकिन सवाल उनके राजनीतिक अनुभव का पर्याप्त इस्तेमाल करने और उन पर भरोसा जताने का था। 2004 की तरह यदि कांग्रेस के पास अनुभवी नेताओं की एक मजबूत रणनीतिक टीम होती, जो गठबंधन की संभावनाओं को समझते हुए सहयोगी दलों के साथ संवाद और रणनीति बना सकती, तो शायद 2024 के बाद देश की राजनीति का नजारा कुछ और होता। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता राजनीतिक परिस्थितियों और गठबंधन की बारीकियों को बेहतर ढंग से समझते हैं। जरूरत केवल उन्हें जिम्मेदारी देने और उनके अनुभव पर भरोसा करने की थी।
देर से ही सही, लेकिन कांग्रेस को शायद अब यह समझ में आने लगा है कि केवल युवा जोश के सहारे बड़ी राजनीतिक लड़ाई नहीं जीती जा सकती। पार्टी को युवा नेतृत्व के साथ अनुभवी नेताओं की समझ, संगठनात्मक पकड़ और रणनीतिक कौशल की भी उतनी ही जरूरत है।
दीपावली मिलन समारोह में नेताओं का एक साथ नजर आना अपने आप में कांग्रेस की राजनीतिक एकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। असली परीक्षा तब होगी, जब पार्टी के भीतर यह एकजुटता फैसलों, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और चुनावी रणनीति में भी दिखाई देगी। राहुल गांधी के सामने चुनौती यही है कि वे युवा नेतृत्व की ऊर्जा को बनाए रखते हुए सोनिया गांधी के दौर के अनुभवी नेताओं को भी उनका उचित स्थान और सम्मान दें।
क्योंकि कांग्रेस को भाजपा से मुकाबला करने के लिए केवल सड़क पर संघर्ष करने वाले नेताओं की जरूरत नहीं है, बल्कि ऐसे राजनीतिक साथियों की भी जरूरत है, जो सही समय पर सही रणनीति बनाकर पार्टी को मंजिल तक पहुंचा सकें। सवाल अब यही है कि क्या दीपावली मिलन का यह संगम कांग्रेस के भीतर एक नई शुरुआत बनेगा और 2029 की राजनीतिक लड़ाई के लिए पार्टी को एक मजबूत टीम दे पाएगा?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)


















